













बीकानेर,आज शिक्षा व्यवस्था का सबसे दुखद और चिंताजनक पहलू यह नहीं है कि स्कूलों में संसाधनों की कमी है, बल्कि यह है कि शिक्षा का मूल उद्देश्य ही धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। *विद्यालय अब संस्कार और व्यक्तित्व निर्माण के केंद्र कम, जबकि वेतन, राजनीति, रिजल्ट प्रतिशत और व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के अड्डे अधिक बनते जा रहे हैं।*
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस शिक्षक को समाज “गुरु” कहकर सम्मान देता था, वही आज कई जगह केवल “सरकारी कर्मचारी” या “निजी संस्थान का स्टाफ” बनकर रह गया है। इसका सीधा नुकसान विद्यार्थियों, अभिभावकों और आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ रहा है।
सरकारी स्कूलों में स्थिति यह है कि अनेक शिक्षक राजनीतिक संरक्षण, यूनियनों की ताकत और प्रशासनिक ढील का लाभ उठाकर जवाबदेही से बच निकलते हैं। समय पर विद्यालय नहीं पहुंचना, पढ़ाई में रुचि ना लेना, विद्यार्थियों की कमजोरियों पर ध्यान ना देना, अभिभावकों से संवाद ना रखना और शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता करना आज सामान्य शिकायत बन चुकी है। जब भी शिक्षा सुधार, जवाबदेही या मूल्यांकन की बात होती है तो संगठित शिक्षक संगठन तुरंत विरोध में खड़े हो जाते हैं।
* *अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना गलत नहीं है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या कभी विद्यार्थियों के अधिकारों के लिए भी उतनी ही ताकत से आंदोलन हुए?*
* क्या कभी सरकारी शिक्षक संगठनों ने कमजोर शिक्षा स्तर, स्कूलों में घटती गुणवत्ता या विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर सामूहिक आत्ममंथन किया?
*दूसरी ओर निजी स्कूलों के शिक्षक भी कम पीड़ा में नहीं हैं।*
* उनसे अत्यधिक काम लिया जाता है, कम वेतन दिया जाता है, नौकरी की असुरक्षा बनी रहती है और प्रबंधन के दबाव में कई बार उनकी स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है।
* लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब सरकारी शिक्षक अपनी समस्याओं के लिए संगठित हो सकते हैं, तो निजी स्कूलों के शिक्षक क्यों नहीं?
* *क्या निजी शिक्षक केवल नौकरी बचाने तक सीमित हो गए हैं?*
* क्या वे इतने भयभीत हैं कि शिक्षा सुधार, शोषण और विद्यार्थियों के हितों पर सामूहिक आवाज तक नहीं उठा सकते?
* या फिर व्यवस्था ने उन्हें इतना कमजोर बना दिया है कि वे स्वयं को केवल वेतन लेने वाला कर्मचारी मान बैठे हैं?
*सच्चाई यह है कि शोषण केवल सरकारी या निजी क्षेत्र में नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था में हो रहा है।*
फर्क सिर्फ इतना है कि आवाज वहां उठती है जहां निजी स्वार्थ प्रभावित होता है।
* वेतन रुके तो आंदोलन होगा, तबादला हो तो विरोध होगा, पदोन्नति रुके तो धरना होगा; लेकिन विद्यार्थियों का भविष्य बर्बाद हो जाए, शिक्षा का स्तर गिर जाए, अभिभावक आर्थिक और मानसिक रूप से टूट जाएं — तब सामूहिक आंदोलन दिखाई नहीं देता।
आज शिक्षक और अभिभावकों के बीच संवाद लगभग समाप्त हो चुका है। विद्यालयों में अभिभावकों को अक्सर केवल फीस जमा कराने, शिकायत सुनने या रिजल्ट लेने तक सीमित कर दिया गया है।
विद्यार्थियों की मानसिक स्थिति, व्यवहार, सीखने की क्षमता और भविष्य को लेकर गंभीर चर्चा बहुत कम होती है।
*कई शिक्षक अपने पद, अनुभव या नौकरी के अहंकार में यह भूल जाते हैं कि वे भी किसी बच्चे के अभिभावक हैं।*
जिस पीड़ा से एक अभिभावक गुजरता है, वही पीड़ा एक शिक्षक को भी अपने बच्चे के भविष्य को लेकर महसूस होती है।
फिर शिक्षा व्यवस्था में संवेदनशीलता और साझेदारी क्यों समाप्त होती जा रही है?
एक शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाला व्यक्ति नहीं होता। *वह समाज की दिशा तय करता है।*
अगर शिक्षक संवेदनहीन हो जाए, राजनीति में उलझ जाए, निजी स्वार्थ में डूब जाए या केवल वेतन तक सीमित हो जाए, तो आने वाली पीढ़ियां भी वैसी ही बनती हैं।
आज आवश्यकता किसी एक वर्ग को दोष देने की नहीं, बल्कि सामूहिक आत्मचिंतन की है।
सरकारी शिक्षकों को राजनीतिक संरक्षण से ऊपर उठकर जवाबदेही स्वीकार करनी होगी। *निजी शिक्षकों को भय और बिखराव छोड़कर शिक्षा सुधार और अपने अधिकारों के लिए संगठित होना होगा।*
विद्यालय प्रबंधन को शिक्षकों को मशीन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माता समझना होगा।
और अभिभावकों को भी केवल अपने बच्चे के नंबर नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्न उठाने होंगे।
यदि शिक्षक, अभिभावक और समाज मिलकर शिक्षा को आंदोलन नहीं बनाएंगे, तो आने वाले वर्षों में डिग्रियां तो बढ़ेंगी, लेकिन शिक्षित और संवेदनशील नागरिक कम होते जाएंगे।
*शिक्षक को फिर से “गुरु” बनना होगा, और अभिभावकों को केवल दर्शक नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के सक्रिय सहभागी बनना होगा।* तभी शिक्षा व्यवस्था बचेगी,
और तभी विद्यार्थियों का भविष्य सुरक्षित हो पाएगा।
