













बीकानेर,बीकानेर की समृद्ध साहित्यक परम्परा में उर्दू अदब का योगदान उल्लेखनीय है इसी संदर्भ में समकालीन दौर में भी विशेषकर शायरी में नवाचार एवं नव रंगत की महक है । आज डॉ. मोहम्मद हुसैन के सम्मान में रखी गई विशेष नशिस्त एक यादगार नशिस्त हुई। जिसमें डॉ. मोहम्मद हुसैन की ताज़ा ग़ज़ल के उम्दा
शे’रो ने नशिस्त को परवान चढ़ाया और इसी कड़ी में
सभी विशेष आमंत्रित शायरों के कलाम भी एक से एक उम्दा रहे
जिन्होंने वाह-वाही बटोरी” यह उद्गार व्यक्त किए वरिष्ठ कवि कथाकार कमल रंगा ने। आपने आज बीकानेर साहित्य संस्कृति कला संगम की तरफ से नज़ीर ग़ौरी सभागार में प्रोफ़ेसर मोहम्मद हुसैन के सम्मान में रखी गई शे’री नशिस्त की अध्यक्षता करते हुए यह उद्गार व्यक्ति किए।
कला संगम के संस्थापक अध्यक्ष शायर क़ासिम बीकानेरी ने बताया कि इस मौके पर कमल रंगा ने अपनी राजस्थानी कविता की इन पंक्तियों के प्रस्तुतीकरण द्वारा श्रोताओं से भरपूर तारीफ़ें पाई-‘सुपनां रै रंगां राच्योड़ी
बणी ठणी थूं
कद बदल लीन्हौ भेख
ठाह ही नीं पड़ी।’
इस मौक़े पर शे’री नशिस्त के मुख्य अतिथि उर्दू शायर समालोचक प्रोफ़ेसर मोहम्मद हुसैन ने अपनी एक से बढ़कर एक उम्दा ग़ज़लें सुना कर श्रोताओं को वाह वाह कहने पर मजबूर कर दिया। आपकी ग़ज़ल के इस मतलअ और शे’र को भरपूर पसंद किया गया-
‘मुश्को-अंबर से फ़ुज़ुं लफ़्ज़ों से ख़ुशबू आए,
तेरी दहलीज़ को गर फ़िक्र मेरी छू आए।’
‘फ़िक्र में रंग भरे लहजे से ख़ुशबू आए
मीर-ओ-ग़ालिब की तरह हमको जो उर्दू आए।
इसके अलावा डॉ. मोहम्मद हुसैन ने ग़ज़ल में नव प्रयोग करते हुए अपनी ग़ज़लों के प्रस्तुतीकरण से ऐसा समां बांधा सभी श्रोताओं ने आपके कलाम की दिल खोलकर तारीफ़ की।
शायर क़ासिम बीकानेरी की ग़ज़ल के इस शे’र को बहुत सराहा गया-‘मुश्को अंबर की क्या ज़रूरत है। खत में कोई गुलाब आने दो।’
उर्दू शायर वली मोहम्मद ग़ौरी के कलाम को श्रोताओं ने भरपूर पसंद किया। आपके इस शे’र पर आपको ख़ूब दाद मिली-‘क्या ख़बर थी चलते-चलते हादसा हो जाएगा,
जो सफ़र में हम-सफ़र है वो जुदा हो जाएगा।’
शायर इरशाद अज़ीज़ ने तरन्नुम में ग़ज़ल सुना कर ख़ूब वाह वाही हासिल की। आपका यह शे’र ‘साहिल पे आके डूबने वाले ने यूँ कहा। तूफ़ान मेरे दिल में है दरिया में कुछ नहीं’
श्रोताओं के दिल में उतर गया।
वरिष्ठ ग़ज़लकार राजेंद्र स्वर्णकार ने बेहतरीन तरन्नुम के साथ अपनी ग़ज़ल पेश की जिसे ख़ूब दादो तहसीन से नवाज़ा गया। ख़ासतौर से आपके इस शे’र ‘मैं सफ़र पे चला जब भी परदेश को। मेरी मां के नयन डबडबाते रहे’ को ख़ूब पसंद किया गया।
रे शीन बीकानेरी उर्फ रवि शुक्ला ने अपनी ग़ज़ल के इस मतलअ ‘आंखों से मयकशी का मज़ा हमसे पूछिए,
रस्मन कभी-कभी का मज़ा हमसे पूछिए’ के प्रस्तुतीकरण से शे’री नशिस्त में नया रंग भरा।
वरिष्ठ कवि प्रमोद कुमार शर्मा ने अपने कलाम की इन पंक्तियों ‘मैं अकेला कब हूं सारे साथ मेरे देख लो।
एक मैं ही हूं नहीं इस आखिरी किरदार में’ के प्रस्तुतीकरण से सभी को लुत्फ़ अंदोज़ कर दिया
नौजवान शायर मोइनुद्दीन ‘मुईन’ अपनी अलग अंदाज़ की ग़ज़ल पेश करके शे’री नशिस्त को परवान चढ़ाया। आपके इस शे’र ‘ज़रा बतलाओ दिल की ख़ैर ख़्वाही चाहने वालों,
शहर से उन के आते हो मेरे ग़म की दवा लाए।’ को ख़ूब सराहा गया। नौजवान शायर माजिद ख़ान माजिद ने आज के ताज़ा हालात को अपनी ग़ज़ल के इस शे’र ‘हवाओं में सियासत हो रही है। ज़हर सब में उतारा जा रहा है’ के माध्यम से प्रस्तुत किया।
इससे पूर्व शे’री नशिस्त का आग़ाज़ हाफ़िज़ ज़िया मोहम्मद बीकानेरी ने तिलावते कलामे पाक से किया।
नशिस्त में तशरीफ़ लाए तमाम शोअरा का इस्तक़बाल मुफ़्ती अशफ़ाक़ ग़ौरी रज़वी ने किया। आख़िर में सभी का शुक्रिया वली मोहम्मद ग़ौरी ने अदा किया।
