











बीकानेर,जून 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया, तो उन्होंने अनजाने में भारतीय लोकतंत्र की उस नई नींव की आधारशिला रख दी थी, जिसने आने वाले पांच दशकों की राजनीति को परिभाषित करना था। 1977 का चुनाव महज एक मतदान नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों की बहाली का जनादेश था, जिसने मोरारजी देसाई के रूप में देश को पहला गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री दिया। 2026 के वर्तमान परिदृश्य में खड़े होकर जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि पिछले पचास वर्षों में भारतीय राजनीति ने न केवल चेहरों को बदलते देखा है, बल्कि वैचारिक धरातल पर कई जन्म और पुनर्जन्म भी देखे हैं। यह सफर कांग्रेस के एकदलीय वर्चस्व के पतन से शुरू होकर मंडल-कमंडल के संघर्ष, गठबंधन सरकारों के अस्थिर प्रयोग और अंततः राष्ट्रवाद व विकास के नए युग तक फैला हुआ है। यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का ही प्रमाण है कि उसने आपातकाल के काले अध्याय से लेकर एकदलीय वर्चस्व की वापसी तक के हर बवंडर को आत्मसात किया है।
1977 में जनता पार्टी का उदय भारतीय राजनीति में कांग्रेस-मुक्त विकल्प का पहला गंभीर प्रयोग था। आपातकाल के दौरान प्रेस पर प्रतिबंध और नागरिक अधिकारों के निलंबन ने जनता के भीतर जो आक्रोश पैदा किया था, उसने सत्ता के समीकरणों को जड़ से हिला दिया। हालांकि, जनता पार्टी के भीतर वैचारिक अंतर्विरोधों और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं ने उस ऐतिहासिक जनादेश को अल्पकालिक बना दिया, जिससे यह सिद्ध हुआ कि गठबंधन बनाना सरल है लेकिन उसे वैचारिक निरंतरता देना कठिन। इसके बाद 1980 के दशक में इंदिरा गांधी की वापसी और 1984 में उनकी दुखद हत्या ने सहानुभूति की ऐसी लहर पैदा की, जिसने राजीव गांधी को ऐतिहासिक बहुमत दिलाया। राजीव गांधी ने आधुनिकता और तकनीक की नई भाषा तो गढ़ी, लेकिन उनके कार्यकाल में बोफोर्स और शाह बानो जैसे मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय राजनीति अब पहचान और पवित्रता के दोराहे पर खड़ी है।
1990 का दशक भारतीय राजनीति के इतिहास में सबसे निर्णायक मोड़ साबित हुआ, जब मंडल यानी सामाजिक न्याय और कमंडल मतलब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विचारधाराएं आमने-सामने थीं। मंडल आयोग की सिफारिशों ने जहां पिछड़े वर्गों को राजनीति की मुख्यधारा में लाकर खड़ा किया, वहीं लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा ने भाजपा के आधार को नई संजीवनी दी। इसी दौर में पी.वी. नरसिंह राव के नेतृत्व में हुए आर्थिक सुधारों ने देश को समाजवादी ढांचे से बाहर निकालकर बाजार-उन्मुख अर्थव्यवस्था की ओर धकेला। यह वह समय था जब विचारधाराएं बदल रही थीं और देश एक साथ सामाजिक मंडल, धार्मिक कमंडल और आर्थिक उदारीकरण के त्रिकोण पर चल रहा था। बाबरी मस्जिद के विध्वंस और उसके बाद भाजपा के बढ़ते प्रभाव ने स्पष्ट कर दिया कि अब राजनीति का केंद्र बिंदु बदल चुका है, जिसकी परिणति अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहली सफल गैर-कांग्रेसी गठबंधन सरकार के रूप में हुई।
21वीं सदी की शुरुआत ने भारतीय संघवाद को नए आयाम दिए। वाजपेयी युग ने न केवल परमाणु परीक्षण और बुनियादी ढांचे के विकास से देश को नई पहचान दी, बल्कि गठबंधन धर्म को भी सफलतापूर्वक निभाया। हालांकि, 2004 में इंडिया शाइनिंग की विफलता ने यह सबक दिया कि केवल विकास की चमक सत्ता की वापसी की गारंटी नहीं है। इसके बाद यूपीए के दस वर्षों ने अधिकार-आधारित राजनीति जैसे आरटीआई, मनरेगा, आरटीई को जन्म दिया, लेकिन यूपीए-2 के दौरान सामने आए व्यापक भ्रष्टाचार के आरोपों और शासन की शिथिलता ने जनता के भीतर गहरा असंतोष पैदा किया। अन्ना हजारे के आंदोलन ने उस आक्रोश को संगठित किया, जिसने 2014 में नरेंद्र मोदी के रूप में एक ऐसे नेतृत्व का मार्ग प्रशस्त किया, जिसने हिंदुत्व, प्रखर राष्ट्रवाद और अंत्योदय का एक नया राजनीतिक व्याकरण तैयार किया।
2014 से 2024 तक का दशक मोदी युग के रूप में जाना जाएगा, जिसने 1984 के बाद पहली बार देश को स्पष्ट बहुमत की स्थिर सरकार दी। इस दौर में अनुच्छेद 370 का खात्मा, राम मंदिर निर्माण और डिजिटल इंडिया जैसे अभियानों ने भाजपा को एक अपराजेय शक्ति के रूप में स्थापित किया। कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से लाभार्थी वर्ग का निर्माण करना मोदी की सबसे बड़ी रणनीतिक सफलता रही, जिसने पारंपरिक जातीय समीकरणों को भी चुनौती दी। हालांकि, 2024 के आम चुनाव परिणामों ने एक बार फिर भारतीय राजनीति की विविधता को रेखांकित किया। भाजपा के 240 सीटों पर सिमटने और एनडीए के सहारे सरकार बनाने की मजबूरी ने संकेत दिया कि भारत में गठबंधन की अनिवार्यता अभी समाप्त नहीं हुई है। दक्षिण और पूर्व में विस्तार के बावजूद, हिंदी पट्टी में आए बदलावों ने यह सिद्ध कर दिया कि बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक न्याय जैसे जमीनी मुद्दे आज भी मतदाताओं के लिए सर्वोच्च हैं।
कुल मिलाकर देखें तो 1977 से 2026 तक का यह पचास वर्षीय सफर भारतीय लोकतंत्र की अद्भुत अनुकूलनशीलता की कहानी है। हमने देखा है कि कैसे एक मजबूत प्रधानमंत्री के बाद गठबंधन का दौर आता है और कैसे गठबंधन की अस्थिरता से ऊबकर जनता पुनः एक मजबूत नेतृत्व चुनती है। आज की राजनीति जहां डेटा, सोशल मीडिया और रणनीतिक प्रबंधन पर टिकी है, वहीं इसके मूल में आज भी वही बुनियादी ढांचा है जिसकी रक्षा सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती मामले में की थी। आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति जातीय जनगणना की मांग और विकसित भारत के लक्ष्य के बीच एक नया संतुलन खोजने का प्रयास करेगी। पिछले पांच दशकों का अनुभव हमें विश्वास दिलाता है कि चुनौतियां कितनी भी बड़ी क्यों न हों, भारतीय लोकतंत्र हर बार नए और परिपक्व रूप में उभरने की क्षमता रखता है।
