











बीकानेर,बीकानेर के छठे शासक राजा रायसिंहजी द्वारा जूनागढ़ फोर्ट की नींव 1589 ई. में रखी गई थी। यह किला अपनी लाल बलुआ पत्थर की वास्तुकला,महलों और संग्रहालय के लिए प्रसिद्ध हैं। यह किला बीकानेर आने वाले देशी विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहा हैं। यह किला 1902 तक बीकानेर के 20 शासकों का निवास स्थान बना रहा। महाराजा गंगासिंह 1902 तक जूनागढ़ किले में ही रहे।
जूनागढ़ किला सबसे उत्कृष्ट भुमि निर्मित किलों में से एक हैं जो कि सदियों से कई युद्ध लड़ें जाने के बावजूद अनेक हमलों के बाद भी काई शत्रु इस किले पर कब्जा नही कर पाया। बीकानेर के 23वें शासक महाराजा डॉ करणीसिंहजी एक दुरदर्शी व्यक्ति थे तथा अपने पूर्वजों द्वारा निर्मित जूनागढ़ किला व लालगढ पैलेस के संरक्षण व आने वाली पीढी के लिए संजोकर रखने के प्रति प्रतिबद्ध थे। इस क्रम में उन्होंने महाराजा रायसिंहजी ट्रस्ट व महाराजा गंगासिंहजी ट्रस्ट की स्थापना कर जूनागढ़ किले को महाराजा रायसिंहजी ट्रस्ट में व लालगढ़ पैलेस को महाराजा गंगासिंजी ट्रस्ट में निहित कर दिया। ये किला व पैलेस विश्वभर के पर्यटकों के लिए खुले हैं तथा आकर्षण के केन्द्र हैं। महाराजा डॉ.करणीसिंहजी ने अपने जीवनकाल में इस ऐतिहासिक ईमारत जुनागढ़ फोर्ट को राष्ट्रीय धरोहर मानते हुए मूल ढाँचे में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होने दिया तथा इसकी होमोजैनेटी को बनाए रखते हुए इसको संरक्षित रखा व अपनी वसीयत में इस सम्बन्ध में प्रावधान भी किया कि उनके पश्चात इन ऐतिहासिक ईमारतों के मूल स्वरुप के साथ किसी प्रकार से छेड़छाड़ ना की जाए। स्व.महाराजा डॉ करणीसिंह जी की ईच्छा अनुसार उनके पश्चात उनकी ज्येष्ठ पुत्री प्रिसेंस राज्यश्री कुमारी ने इस विरासत के संरक्षण हेतू तय मापदण्डों के आधीन,विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार इस किले के मूल स्वरुप व संरचना का ध्यान में रखते हुए प्राचीन निर्माण शैलियों व सामग्रियों के अनुसार इसमें सौन्दर्यकरण व देख रेख आदि कार्य करवाए अभी हाल ही में प्रैस व शोसल मिडिया के माध्यम से जूनागढ़ किले पर हो रहे रंग रोगन का मामला प्रिंसेस राज्यश्री कुमारी जी के घ्यान में आया तो उन्होंने तुरन्त प्रभाव से अपना ऐतराज दर्ज करवाते हुए वक्तव्य जारी किया कि….
मेरे संज्ञान में आया हैं कि ऐतिहासिक जूनागढ़ किले की बाहरी दिवारों पर रंगाई-पुताई का कार्य चल रहा हैं। इस कार्य को देखने मात्र से आभास होता हैं कि यह रंगाई का कार्य करवाने में ना तो कोई सर्वे करवाया गया,ना ही विरासत संरक्षण विशेषज्ञों की सलाह ली गई हैं ना ही प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्व स्थल एवं अधिनियम 1958 के तहत तय मापदण्डों की पालना की गई हैं। जूनागढ़ किले की बाहरी दिवारों पर जो रंग करवाने का कार्य किया जा रहा हैं वो निम्न मानकों का होने तथा यह कलर इसके मूल कलर से भिन्न होने से ना सिर्फ इसके मूल स्वरुप को बदल रहे हैं बल्कि इसके ऐतिहासिक महत्व,स्वरुप व भव्यता को नष्ट कर रहा हैं। ऐतिहासिक धरोहरों पर इस तरह से लापरवाही पूर्ण कार्य ना सिर्फ बीकानेर के इतिहास को मिटा रहा हैं बल्कि पुरामहत्व की पूर्ण अनदेखी होने से राष्ट्रीय सम्पदा व धरोहर के साथ खिलवाड़ हैं। इस तरह के कार्य पर तुरन्त प्रभाव से रोक लगनी चाहिए।
मैं देश की तमात ऐतिहासिक व पुरा ईकाइयों व सक्षम ऑथोरिटी से अभाल ऐतिहासिक धरोहर के साथ इस तरह तुरन्त प्रभाव से रोका जाए ताकि इसके महत्व संरक्षण से जुड़ी संस्थाओं, करती हूँ कि जुनागढ़ किले जैसी खिलवाड़ को संज्ञान में लेकर इसे ऐतिहासिक महत्व व भव्यता को नष्ट से ना सिर्फ इसके मूल स्वरुप को बदल रहे हैं बल्कि इसके ऐतिहासिक महत्व, स्वरुप व भव्यता को नष्ट कर रहा हैं। ऐतिहासिक धरोहरों पर इस तरह से लापरवाही पूर्ण कार्य ना सिर्फ बीकानेर के इतिहास को मिटा रहा हैं बल्कि पुरामहत्व की पूर्ण अनदेखी होने से राष्ट्रीय सम्पदा व धरोहर के साथ खिलवाड़ हैं। इस तरह के कार्य पर तुरन्त प्रभाव से रोक लगनी चाहिए। ताकि इसके ऐतिहासिक महत्व व भव्यता को नष्ट होने से रोका जाकर किले का उचित संरक्षण किया जा सके। साथ ही हमनें उक्त सन्दर्भ में अपने अधिवक्ताओं से बातचीत कर ली हैं यदि जरुरत हुई तो मामला कोर्ट तक ले जाया जायेगा।
गोविन्दसिंह मुख्य कार्यकारी अधिकारी
