










बीकानेर,बीकानेर में कोई भी नया अफसर आए तो कुछ संगठन पदाधिकारी और कुछेक लोग स्वागत की रस्म अदायगी में सबसे आगे रहते हैं। यह कितना नैतिक है ? इस पर सवाल उठते रहे हैं। आम जनता ऐसे लोगों की हिकीकत भी जानती हैं। बात खुसर फुसर में बिसार दी जाती है, परन्तु इसके मायने कितने दुखदायी होते हैं। यह समझने की जरूरत है। पुष्पगुच्छ और दुपट्टा लेकर पहुंच वाले लोग कौन है ? उनको इन अफसरों के सम्मान की क्या जरूरत है। अफसर भी क्यों सम्मान पाते हैं ? वे कोई जन प्रतिनिधि तो है नहीं जो पब्लिक रिलेशन उनकी जररूत है। उनको जनता से वोट थोड़े ही लेने होते हैं ? अफसर अपना काम बिना पुष्पगुच्छ लिए भी कर सकते हैं। जितनी जरूरत हो उतना आम लोगों से सम्पर्क भी रखे। बाकी तो उनके काम का अपना सिस्टम है। सब मामलों में तो नहीं परन्तु कई मामलों में इस तरह से सम्मान पाना नैतिक भ्रष्टता की श्रेणी में भी आ सकता है। इसका आशय यह कतई नहीं है कि अफसरों का सम्मान नहीं करना चाहिए। जो अफसर अपने दायित्वों पर खरे हैं और सम्मान के हकदार है तो समाज को सम्मान देना ही चाहिए। वे भी लोकतंत्र के हिस्से ही तो है, परन्तु ऐसे पुष्पगुच्छ और दुपट्टा पहनाकर सम्मान देने का मंतव्य क्या है ? वास्तव में यह उनका कितना सम्मान है। सम्मान पाने वाले को जांचने की जरूरत है।
पिछले दिनों जब बीकानेर आईजी ने कार्यभार संभाला तो एक व्यापारिक संगठन के शिष्टमंडल ने उनका पुष्पगुच्छ देकर स्वागत किया। अब बीकानेर के नए पुलिस अधीक्षक को पुष्पगुच्छ और दुपट्टा पहनाकर स्वागत किया जा रहा है। बाकी पुराने अफसर भी जब आए तो इसी तरफ के लोग उनके इर्द-गिर्द सबसे पहले मंडराने लगे। ऐसे लोगों का अपना एन्जेण्डा होता है। किसी अफसर के आने से लेकर जाने तक ये लोग अफसरों के मनो – मस्तिष्क में छाए रहते हैं। हद तो तब होती है कि अफसरों के फोटो लगे होल्डिंग चारौह पर लगाकर उनकी वाह वाही करते है। भले ही जनता में उनकी छवि संवेदनहीन अधिकारी की हो पर वाह वाही करने वालों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता।
कई संगठनों में तो मोमेटों, दुपट्टा, नारियल और पुष्पगुच्छ विशेष तौर पर अफसरों को राजी रखने के लिए थोके के भाव में लाए होते हैं। ये सम्मान पाने वाले अफसर भी ऐसे लोगों को ही बीकानेर के सर्वेसर्वा मानते हैं और उनके चलाए ही चलते है। आम लोगों और अन्यों से उनको कोई वास्ता नहीं रहता। जब वे चले जाते हैं तो पुष्पगुच्छ देने वाले ही उनको विदाई देते है। यह एक तरह का व्यवस्था में काकस बन गया है। जो अफसरों और जनता के बीच दुराव पैदा करता है। अफसरों की नजदीकी का माहौल बनाकर अपना होना साबित करते है। अफसर भी कभी कभी इनके हिस्से बन जाते हैं। जनता में उनकी कोई अच्छी छवि नहीं बन पाती। कुछ अफसर सबका दुपट्टा और पुष्पगुच्छ रख लेते हैं परन्तु कईयों के मंसूबे पूरे नहीं होने देते।
एक वरिष्ठ सामाजिक कार्याकर्ता की पुलिस अधीक्षक मृदुल कच्छावा से शिष्टाचार भेंट कर हिन्दू नववर्ष विक्रम सम्वत् 2083 की शुभकामना देते हुए डिजिटल मीडिया में फोटो सहित खबर वायरल हुई। बताया गया कि इस दौरान उन्होंने ने एसपी मृदुल कच्छावा से बीकानेर जिले की कानून व्यवस्था पर भी चर्चा की। जिला पुलिस अधीक्षक को पुष्प गुच्छ देकर व दुपट्टा पहनाकर एवं गौमाता की प्रतिमा प्रदान कर सम्मान किया। ऐसे कई लोग है जो अफसरों का सम्मान करने की लाइन में लगे हैं। इसका जनता में संदेश क्या जाता है। इसका आकलन करने की जरूरत है।
