











बीकानेर,बिश्नोई समाज में होली का त्योहार एक विशेष तरीके से मनाया जाता है। वे होलिका दहन नहीं करते हैं, बल्कि प्रहलाद की भक्ति और सत्य की विजय के रूप में मनाते हैं। इसका कारण यह है कि बिश्नोई समाज पेड़ और वन्यजीवों की रक्षा के लिए समर्पित है और होलिका दहन को पर्यावरण के लिए हानिकारक मानता है ।
होली के दिन, बिश्नोई समाज के लोग सुबह हवन करते हैं और पाहल (पवित्र जल) ग्रहण करते हैं। वे एक-दूसरे से प्रेम से गले मिलते हैं और मिठाई बांटते हैं, लेकिन किसी पर रंग नहीं डालते हैं। यह परंपरा प्रहलाद की भक्ति और सत्य की विजय के प्रतीक के रूप में मनाई जाती है।
बिश्नोई समाज के 29 नियम हैं, जिनमें से एक है पर्यावरण की रक्षा करना। वे पेड़-पौधों और जानवरों की रक्षा के लिए काम करते हैं और होली जैसे त्योहारों पर भी इसका पालन करते हैं ।
इसका कारण बिश्नोई समाज जाम्भोजी के पंथ की स्थापना से पहले ही होलिका पाहल प्रह्लाद जी ने बनाया था। इसका स्पष्ट उल्रेख बिश्नोई समाज की शबदवाणी में कलश पूजा एवं पाल मंत्र में है। जो गुरु जाम्भोजी के मुख से उच्चारित है।
जाम्भो जी के पृथ्वी पर अवतरण का मूल कारण नृसिंह अवतार के समय प्रह्लाद को दिए वचन हैं।
बिश्नोई समाज भक्त प्रह्लाद को जम्भेश्वर जी के बाद अपना गुरु मानता है। प्राचीन में बिश्नोई समाज को प्रह्लाद पंथी कहा जाता था।
इसका एक कारण यह है कि जब होलिका के द्वारा अपनी गोद में बिठाकर प्रह्लाद को भस्म करने का प्रयास किया। परमात्मा की कृपा से प्रह्लाद बच गए। होलिका भस्म हो गई। उस समय जो राक्षस थे, उन्हें लगा कि प्रह्लाद भस्म हो गए। इस खुशी में उन्होंने शराब जैसे नशीले पदार्थ पी, तरह- तरह के पकवान बनाकर खाए। अश्लीलता का प्रदर्शन किया। कीचड़ उछाला गया, हर वो अनैतिक कार्य किया जो धर्म विरुद्ध आचरण कहलाता था।
वहीं दूसरी ओर प्रह्लाद को जो अपना पथ प्रदर्शक मानते थे। उन्हें लगा कि प्रह्लाद होलिका की अग्नि में प्रविष्ट होकर भस्म हो गए। वे गहरे शोक में डूब गए। उस वक्त प्रह्लाद के अनुयायियों ने अपने घर में भोजन नहीं बनाया। सभी भूखे रहे और शोक मनाया। लेकिन जो बीमार वृद्ध थे और बच्चे थे, भूखे रहने में असक्षम थे। उनके लिए दलिया (सादा व सात्विक भोजन) बनाया गया। इस तरह समर्थवान लोगों ने भोजन नहीं कर भगवान विष्णु का रातभर स्मरण किया। लेकिन, दूसरे दिन सुर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहुर्त में प्रह्लाद जी भगवान विष्णु का गुणगान करते हुए अपने अनुयायियों के बीच में पहुंचे, तब सब खुशी से झूम उठे। इस दौरान जब खुशी के मारे अनुयायी प्रह्लाद जी के नजदीक आने लगे तब उन्होंने कहा कि ‘ रात्रिकाल में होलिका का दहन हो चुका है। अत: मैं स्वयं इस समय अपवित्र हूं। तब उन्होंने कहा कि पहले मैं स्नान आदि से निवृत होता हूं। इसके बाद हम सबको पाहल बनाना है। इस प्रकार भगवान प्रह्लाद स्नानादि से निवृत होकर सुतक काल के बाद पाहल बनाते हैं और ग्रहण करते हैं। तब से लेकर अब तक यह परंपरा निरंतर चली आ रही है। बिश्नोई समाज आज भी होली नहीं मनाता, ना ही रंगों से खेलता है। अपितु होली के बाद सुतक काल समाप्त होने के बाद पाहल बनाकर ग्रहण करता है, फिर नए स्वच्छ कपड़े पहनता है। पकवान बनाए जाते हैं और भक्त प्रह्लाद के सकुशल होने की खुशी में समाज एक जाजम पर बैठता है।वहां समाज में अच्छाई लाने के लिए कुरितियों पर चर्चा कर उनके उन्मूलन का प्रयास किया जाता है। हर साल कुछ अच्छा करने का संकल्प लिया जाता है। जाम्भोजी के बताए २९ नियमों की पालना को लेकर युवा पीढ़ी को अवगत कराता है,उन्हें बुराईयों से दूर रहने का संकल्प दिलाता है। इस प्रकार एक पहल जो पाहल का रूप लेकर यह दर्शाती है कि होली का त्यौहार किस प्रकार और कैसे मनाया जाता है। हालांकि अब हर धर्म में अपवाद स्वरूप कुछ ना कुछ बदलाव हो रहे हैं। ऐसे में बिश्नोई समाज भी अछूता नहीं है। यहां भी नियम पालना में शिथिलता देखी जाने लगी है। इसे धर्म सम्मत ठीक नहीं कहा जा सकता। लेकिन, इस पर मनन और चिंतन की गहन आवश्यकता महसूस की जा रही है।
क्या है पाहल…?
पाहल बिश्नोई समाज द्वारा सुतक काल के बाद प्रयोग किया जाने वाला वह शुद्ध जल होता है, जो मंडप सजाकर, विधि-विधान से हवन कुंड बनाकर उसके समीप पवित्र जल का कलश रखा जाता है। हवन कुंड में मंत्रो से ज्योति प्रज्वलित कर मंत्रोच्चारणों के साथ हवन करते हैं। गुरु महाराज शबदवाणी से गुरु की कलश स्थापना के मंत्र से पाहल बनाया जाता है।
बिश्रोई समाज के साधु-संत, गायणाचार्य द्वारा विभिन्न हिस्सों में लाखों जगह पाहल बनाया जाता है। उस पाहल को ग्रहण करने के बाद मे बिश्नोई समाज के लोग अन्न ग्रहण करते हैं। यह नियम बिश्नोई समाज के उन लोगों के लिए भी लागू होता है, जो विदेश में रहते हैं। लेकिन, ें इस परिस्थिति में वे स्वयं पाहल बना सकते हैं।
मेरा मानना है..
२०२६ की होली का संयोग – आमतौर पर सभी जगह सुबह 9.30 बजे तक पाहल बनना (यदि पाहल को विधिपूर्वक संपन्न किया जाता है, करीब तीन घंटे का समय लगता है।) संभव नहीं है। आजकल आमतौर पर देखा जाता है कि भौतिकवादी युग में युवा पीढ़ी सुबह ९.३० बजे तक दैनिक कार्यों से भी निवृत्त नहीं होती। ऐसी स्थिति में कई लोग पचास किलोमीटर दूर तक का सफर तय कर पाहल लेने के लिए आते-जाते हैं। इस दौरान उन्हें काफी समय भी लगता है। ऐसे में सुतक काल में पाहल को ग्रहण करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। अत: मेेरे बिश्नोई समाज के सभी विद्वानों से आग्रह है कि चार तारीख को ही पाहल का कार्यक्रम आयोजित हो। इससे होलिका एवं चन्द्रग्रहण दोनों का सुतक समाप्त हो जाएगा।
उदाहरण के लिए यदि किसी ने सुतक से पहले पाहल बना भी लिया तो भी सुतक लगने से लेकर काल समाप्त होने तक भोजन ग्रहण निषेद्य है। तब उस पाहल का कोई महत्व नहीं रह जाता। इसका मूल कारण यह है कि बिश्नोई समाज में होली नहीं खेली जाती है और बिश्नोई समाज की प्रह्लाद जी से लेकर आज तक परंपरा के अनुसार सुतक काल के बाद ही पाहल ग्रहण करने के पश्चात में घरों में स्वादिष्ट पकवान बनाए जाते हैं, नए वस्त्र धारण किए जाते हैं। समाज के लोग एक जाजम पर बैठकर समाज हित में चिंतन करते हैं, सामाजिक बुराईयों को समाप्त करने का संकल्प लेते हैं।
पाहल चार मार्च को बनाए जाने का एक मुख्य कारण यह भी..
मेरा यह मानना है कि आमतौर पर सभी जगह सुबह सुतक 3 मार्च को सुबह 9.30बजे लगेगा। प्रवेश दो पहर 2 बजकर 14 मिनट से, स्पर्श 3 बजकर 20 मिनट से सम्मिलन और 4.35 पर मध्य, 5 बजकर 04 मिनट पर उन्मिलन, 5 बजकर 53 मिनट पर मोक्ष, सांय 6 बजकर 47 मिनट पर विरल छाया से निर्गम एवं 7 बजकर 53 मिनट पर भोजन कर सकते हैं।
(लेखक रामेश्वरलाल बिश्नोई सामाजिक कार्यकर्ता हैं और अनेक संस्थाओं का संचालन करते हैं, आप अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा, मुकाम के विशेष आमंत्रित सदस्य भी हैं।-(99 82 37 85 52)
