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बीकानेर,गंगाशहर,तेरापंथी सभा गंगाशहर द्वारा शांतिनिकेतन सेवा केंद्र में आयोजित एक विशेष आध्यात्मिक कार्यक्रम में साध्वी  विशदप्रज्ञा जी ने जीवन, मृत्यु और आत्म-कल्याण के गहरे रहस्यों पर प्रकाश डाला। अपने मंगल उद्बोधन में साध्वी ने कहा कि संसार में सभी भौतिक द्रव्यों और पुद्गलों का मिलना-बिछड़ना (संयोग-वियोग) निश्चित है, लेकिन केवल आत्मा ही शाश्वत, अजर और अमर है। ज्ञान और दर्शन के लक्षणों वाली यह आत्मा कभी नष्ट नहीं होती।

साध्वी ने चार गतियों—नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव—का उल्लेख करते हुए मनुष्य गति को सर्वश्रेष्ठ बताया। उन्होंने जोर देकर कहा कि मनुष्य के पास अनंत शक्ति, ज्ञान और बुद्धि होती है। यदि मनुष्य अपनी इन शक्तियों का सदुपयोग करता है, तो वह मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है, अन्यथा शक्तियों के दुरुपयोग से वह अधोगति (नरक) की ओर जाता है। उन्होंने संथारा और संलेखना को दुनिया की सबसे विलक्षण कला करार देते हुए कहा कि आगमों में वर्णित तीन मनोरथों में सर्वश्रेष्ठ मनोरथ ‘संथारा’ की कामना करना ही है।

संलेखना और संथारा की सूक्ष्मताओं को समझाते हुए साध्वी जी ने बताया कि संलेखना वास्तव में संथारे की पूर्व तैयारी है। यह दो प्रकार की होती है—द्रव्य और भाव। जब व्यक्ति के मन से आहार, शरीर, परिवार, नाम और यश के प्रति आसक्ति समाप्त हो जाती है, तभी वह संथारा साधना की ओर बढ़ सकता है। मोह विजय, रस विजय, ध्यान, स्वाध्याय और तप के माध्यम से शरीर और मन को मजबूत किया जाता है। उन्होंने संथारा के तीन प्रकारों—भक्तपान, इंगिनी मरण और पोदोपगमन—का भी विवरण साझा किया।

साध्वी श्री ने स्पष्ट किया कि संथारा किसी दबाव, प्रलोभन या नाम-यश के लालच में नहीं, बल्कि केवल आत्म-कल्याण और दृढ़ मनोबल के साथ किया जाता है। यह ‘मरने की कला’ है, जहाँ व्यक्ति समता भाव से शरीर का मोह त्यागकर मृत्यु का वरण करता है। उन्होंने उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं का आह्वान किया कि यदि वे अपने जीवन के अंतिम पृष्ठ को उज्ज्वल बनाना चाहते हैं और मृत्यु को महोत्सव के रूप में मनाना चाहते हैं, तो उन्हें संलेखना का अभ्यास प्रारंभ कर संथारा साधना की ओर गतिमान होना चाहिए। इस अवसर पर साध्वी मननयशा जी ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

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