










बीकानेर,जयपुर। संयुक्त अभिभावक संघ ने देश में बढ़ती सामाजिक अव्यवस्थाओं, जनसुरक्षा की कमजोर व्यवस्थाओं और युवाओं पर बढ़ते मानसिक दबाव को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। संघ का कहना है कि आज देश का युवा सैकड़ों विडंबनाओं से जूझ रहा है, जिसके कारण उसका भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है।
*संघ प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि* विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट के अनुसार मेंटल हेल्थ के मामलों में 80 देशों की सूची में भारत का स्थान 60वें नंबर पर होना बेहद चिंताजनक और पीड़ादायक स्थिति को दर्शाता है। यह स्थिति बताती है कि युवाओं और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सरकारों की नीतियां और व्यवस्थाएं पर्याप्त नहीं हैं।
संयुक्त अभिभावक संघ ने कहा कि देश में करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद सड़कों पर जानलेवा गड्ढे बन जाना, बिजली के तारों का अचानक टूटकर गिरना, सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतों की छतों का बच्चों पर गिरना, पेयजल स्रोतों में सीवरेज का गंदा पानी मिलना और लगातार प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर आउट होना जैसी घटनाएं सरकारों की प्रशासनिक विफलताओं को उजागर करती हैं। इन समस्याओं का सबसे बड़ा प्रभाव देश के युवाओं और विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ रहा है।
संघ ने यह भी कहा कि फर्जी डिग्रियों के सहारे डॉक्टर और इंजीनियर बनने जैसे मामलों ने शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। वहीं स्वास्थ्य सेवाओं में बढ़ते निजीकरण के कारण आम नागरिकों और मध्यम वर्ग के लिए इलाज कराना लगातार महंगा और कठिन होता जा रहा है। संयुक्त अभिभावक संघ ने स्वास्थ्य सुरक्षा के नाम पर किए जा रहे अंधाधुंध निजीकरण का कड़ा विरोध करते हुए सरकार से सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की मांग की है।
संघ ने चुनाव सुधारों को लेकर भी सवाल उठाते हुए कहा कि वर्षों पहले चुनाव सुधार के लिए गठित गुप्ता एवं गोस्वामी समिति की रिपोर्ट को आज तक लागू नहीं किया गया, जबकि सर्वोच्च न्यायालय भी इन सुधारों की सिफारिश कर चुका है। यदि समय रहते चुनावी और प्रशासनिक सुधार लागू किए जाते तो आज देश में कई व्यवस्थागत समस्याओं पर अंकुश लगाया जा सकता था।
*संयुक्त अभिभावक संघ के प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि* “आज देश का युवा और विद्यार्थी कई स्तरों पर असुरक्षा और अव्यवस्था का सामना कर रहा है। मेंटल हेल्थ की गिरती स्थिति, शिक्षा व्यवस्था में पेपर लीक, सड़कों और स्कूलों की जर्जर व्यवस्था तथा स्वास्थ्य सेवाओं का लगातार निजीकरण सरकारों की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करता है। यदि समय रहते सरकारें युवाओं, विद्यार्थियों और आम नागरिकों की सुरक्षा तथा भविष्य को लेकर ठोस कदम नहीं उठाती हैं तो यह स्थिति आने वाले समय में और भी गंभीर हो सकती है। केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे राजनीतिक प्राथमिकताओं से ऊपर उठकर देश के युवाओं, विद्यार्थियों और नागरिकों के जीवन, स्वास्थ्य और भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करें।”
संयुक्त अभिभावक संघ ने सरकार से मांग की है कि युवाओं और विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती और बुनियादी नागरिक सुविधाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएं, ताकि देश के भविष्य को सुरक्षित किया जा सके।
