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बीकानेर,दूर्गा कवच के अनुसार सनातन धर्म में कई देवी-देवता हैं जो किसी न किसी ख़ास विशेषता के लिए पूजे जाते हैं। उसी प्रकार माता शीतला की भी महिमा है जो चेचक की देवी, आरोग्य की देवी एवं अन्य संक्रामक बीमारियों की देवी के तौर पर पूजी जाती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर उनकी उत्पत्ति क्यों हुई और हिन्दू धर्म में उनका क्या महत्व है
कौन है शीतला माता? कैसे बनीं वो चेचक और आरोग्य की देवी
शीतला माता को हिन्दू धर्म में रोग-निवारण की देवी के रूप में पूजा जाता है। वे मुख्य रूप से चेचक (Smallpox), खसरा, बुखार और अन्य संक्रामक बीमारियों से रक्षा करने वाली माता मानी जाती हैं।
शीतला माता को माँ दुर्गा का स्वरूप माना जाता है। “शीतला” का अर्थ है — “ठंडी या शांत करने वाली”, जो बुखार और जलन जैसे रोगों से राहत देती हैं। शीतला माता अक्सर गधे पर सवार दिखाई जाती हैं। उनके हाथ में झाड़ू, कलश (जल से भरा), सूप और नीम की पत्तियाँ, भैरव तथा हनुमान भी उनकी सेवा में उपस्थित दर्शया गया है ये सभी रोग निवारण के प्रतीक हैं। उनका शरीर लाल चकत्तों से युक्त दर्शाया जाता है, जो यह बताता है कि वे बीमारी लाने और हटाने दोनों में सक्षम हैं। होली के बाद चैत्र मास की सप्तमी या अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी मनाई जाती है। इस दिन माता को ठंडा भोजन (बासी खाना) अर्पित किया जाता है। इसलिए इसे बासीडो (प्रसाद) भी कहते हैं। मान्यता है कि इस दिन पकाया गया खाना खाने से बीमारियाँ नहीं होतीं। शीतला माता की पूजा बच्चों को चेचक, खसरा और त्वचा रोगों से बचाने के लिए एवं परिवार में आरोग्य , सुख शांति और रोगमुक्ति के लिए आराधना की जाती है। मान्यता है कि माता रूठ जाएं तो घर में बीमारी फैल सकती है।
शीतला माता कथा के अनुसार, ज्वर असुर (जो भगवान शिव के पसीने से उत्पन्न हुआ) जिसे बुखार का मानव रूप माना गया , पुराणों के अनुसार, भगवान ब्रह्मा ने माता शीतला की रचना की। माता शीतला, भगवान शिव के पसीने से उत्पन्न एक ज्वर नामक राक्षस के साथ धरती पर आईं। जब माता शीतला और ज्वर असुर रहने के लिए जगह की तलाश में धरती पर उतरे, तो वे भगवान् शिव के एक भक्त राजा विराट के दरबार में पहुँचे। राजा ने उन्हें अपने राज्य में रखने से इनकार कर दिया। राजा के इस व्यवहार से देवी शीतला क्रोधित हो गई। शीतला माता के क्रोध की अग्नि से राजा की प्रजा के लोगों की त्वचा पर लाल लाल दाने हो गए। लोगों की त्वचा गर्मी से जलने लगी थी। तब राजा विराट ने अपनी गलती पर माफी मांगी। इसके बाद राजा ने देवी शीतला को कच्चा दूध और ठंडी लस्सी का भोग लगाया, तब माता शीतला का क्रोध शांत हुआ। तब से शीतला माता को ठंडे भोजन का भोग लगाने की परंपरा चली आ रही है।

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