











बीकानेर,प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 28 फरवरी को राजस्थान अजमेर आ रहे हैं। वे विदेशों में छाए हुए हैं। दुनिया में मोदी ने भारत का परचम फहराया है। देश की 140 करोड़ जनता का स्वाभिमान बढ़ाया है। मोदी जी थोड़ा घर में भी झांक लो। ऐसा नहीं है कि आप घर में झांकते नहीं हो। पूरा ध्यान देते हो। इतने बड़े कामों के बीच कुछ छोटी बातें छूट रही है। राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करना छोटी प्राथमिकता होने के कारण आपके ध्यान में नहीं आ रही है। यह भी जनभावना का मुद्दा है। राजस्थान के 12 करोड़ लोगों की संस्कृति, साहित्य, परम्परा और रीति रिवाज ही नहीं अस्तित्व से जुड़ा सवाल है। आप राजस्थान में 23 हजार 500 करोड़ के विकास कार्यों की घोषणा करने से पहले राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की घोषणा कर दो। देखो राजस्थान के लोग आपका कितना उपकार मानते हैं।
मातृ भाषा दिवस पर बीकानेर में मोटीयार परिषद ने राजस्थानी की मान्यता की मांग को लेकर धरना दिया। इस धरने में भाजपा के कदवार नेता देवी सिंह भाटी और कांग्रेस के डा. बी.डी. कल्ला शामिल हुए। सवालों के जबाव में इन नेताओं ने कहा कि केन्द्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को प्रधानमंत्री के समक्ष राजस्थानी भाषा की मान्यता के प्रस्ताव पर बात करनी चाहिए। अगर मेघवाल के प्रयासों से राजस्थानी को मान्यता मिलती है तो वे राजस्थान के लोकप्रिय नेताओं में शुमार हो सकेंगे। या तो वे प्रधानमंत्री से बात करने में शर्माते हैं अथवा साहस नहीं जुटा पाते। जो भी हो अभी केन्द्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए है। मोदी की राजस्थान यात्रा के दौरान मेघवाल को यह मुद्दा प्रधानमंत्री के ध्यान में लाना उनका जनप्रतिनिधि होने का धर्म है। मंच से यह मुद्दा प्रधानमंत्री के समक्ष सार्वजनिक होना ही चाहिए। देखते है हमारे जन प्रतिनिधि जिम्मेदारी निभाते हैं या शर्माते है। क्या अर्जुन राम जी साहस जुटा पाएंगे ?
राजस्थानी साहित्य के तुलसी दास माने जाने वाले कन्हैया लाल सेठिया ने कोलकोता में मुझे बताया था कि उप राष्ट्रपति भैरों सिंह शेखातवत ने उनसे वादा किया है कि आपके जीवन काल में राजस्थानी को मान्यता मिल जाएगी। राजस्थानी के साहित्यकार सेठिया अपने जीवन काल में राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग पुरजोर उठाते रहे थे। आज सेठिया जी और भैरों सिंह जी दोनों ही इस संसार में नहीं है। राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में भी शामिल नहीं किया जा सका है। वो पीढ़ी भाषा की मान्यता की मांग पूरी नहीं होने के दर्द के साथ ही विदा हो गई। पूरे राजस्थान प्रदेश में भाषा की मान्यता को लेकर वर्षों से लौ जल रही है। जगह-जगह वर्षों से आन्दोलन हुए जो आज भी सतत रूप से जारी है। राजस्थानी भाषा की मान्यता के आन्दोलन के इतिहास पर किताब लिख दी गई है। मान्यता के पक्ष में इतनी ठोस दलीलें है कि कोई भी सरकार इसको अमान्य नहीं कर सकती। फिर भी भाषा को मान्यता क्यों नहीं दी जा रही है? इसका किसी के पास जवाब भी नहीं है। राज्य विधानसभा में सर्व सम्मति से भाषा को मान्यता देने का प्रस्ताव केन्द्र सरकार के पास विचारार्थ है। राजस्थानी भाषा, साहित्य, संस्कृति की समृध्दता से सब वाकिफ भी है। फिर भी मान्यता क्यों नहीं?
यह सवाल अब राजस्थान के 12 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि के रूप में बीकानेर के भाजपा के नेता देवी सिंह भाटी और कांग्रेस के नेता डा. बी. डी कल्ला ने एक मंच पर बैठकर एक साथ किया है। दोनों दिग्ग्ज नेताओं ने मातृ भाषा दिवस पर बीकानेर में मोटीयार परिषद का राजस्थानी की मान्यता के प्रस्ताव को केन्द्रीय सरकार से पारित करने मांग को लेकर दिए धरने में शामिल होकर सवाल उठाया कि राजस्थानी को मान्यता क्यों नहीं दी जा रही है ? भाटी ने बताया कि उन्होंने केन्द्रीय मंत्री राज नाथ सिंह से इस मुद्दे पर बात की थी। भाषा विभाग में सचिव राजवी महर्षि थे तब कहा गया कि भाषा को मान्यता दे दी जाएगी। इसी मंच से डा. बी.डी. कल्ला बताया कि जब प्रदेश में जब कांग्रेस की सरकार थी तो सभी दलों ने विधानसभा में भाषा की मान्यता का प्रस्ताव सर्व सम्मति से पारित कर केन्द्र को भेजा। अभी तक केन्द्र सरकार ने इस प्रस्ताव पर कारर्वाई ही नहीं की। जब इन नेताओं से एक न्यूज चैनल ने सवाल किया कि भाषा की मान्यता के मुद्दे को राजनीतिक दल फुटबाल बना रहे है।
वैसे अब आवाजें उठने लगी है कि बड़ा जनान्दोलन किया जाए तभी सरकार और नेताओं की आंखें खुलेगी। अगर कोई यह पहल करता है तो राजस्थान भाषा की मान्यता के मुद्दे पर एकजुट होकर सरकार को झुकाने का साम्मर्थ्य रखता। ये स्थितियां नहीं आए और सरकार जनभावना को समझे। केन्द्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल पीएम का जनता के इस मुद्दे पर ध्यान तो आकर्षित करें। प्रधानमंत्री में संवेदना है। वे सकारात्मक निर्णय करेंगे। मोदी जी। राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की सैध्दान्तिक घोषणा अजमेर से ही कर दो ना।
