











बीकानेर,भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र (एनआरसीसी), बीकानेर में आज “सतत उष्ट्र उत्पादन: वन हेल्थ, डेयरी नवाचार और पर्यावरणीय सुरक्षा का एकीकरण” विषयक एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की गई । केंद्र के निदेशक डॉ. अनिल कुमार पूनिया की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम में देश भर के प्रख्यात विषय विशेषज्ञों एवं केन्द्र वैज्ञानिकों ने शिरकत की।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं की-नोट स्पीकर डॉ. अशोक पान्डे, एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर, ऊर्जा और पर्यावरण स्थिरता केंद्र, लखनऊ ने “सूक्ष्म-प्लास्टिक एवं नैनो-प्लास्टिक प्रदूषण तथा मानव एवं पशु स्वास्थ्य पर उसके प्रभाव: चुनौतियाँ एवं भावी दिशा” विषयक व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा कि आज मानव सभ्यता की पहुँच जितनी व्यापक हुई है, प्लास्टिक का विस्तार भी उतना ही सर्वव्यापी हो गया है, लगभग प्रत्येक वस्तु प्लास्टिक से निर्मित होने पर इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है। सूक्ष्म प्लास्टिक एवं नैनो प्लास्टिक का फैलाव वातावरण में होने से मानव स्वास्थ्य इससे बेहद प्रभावित हो रहा है। इसके दुष्प्रभावों से बचने हेतु इसका सीमित उपयोग किया जाना चाहिए। डॉ. पांडे ने कहा कि ऊँट पालन को आधुनिक ऊर्जा और पर्यावरणीय मानकों के साथ जोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती दी जा सकती है।
इस अवसर पर निदेशक डॉ. अनिल कुमार पूनिया ने एनआरसीसी की अनुसंधान गतिविधियों एवं अद्यतन कार्यों की विस्तृत जानकारी देते हुए उष्ट्र प्रजाति के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु भावी अनुसंधान योजनाओं तथा व्यावहारिक पहलों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वैश्विक परिदृश्य में जहाँ ऊँटों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है, वहीं भारत में यह चिंताजनक रूप से सीमित होती जा रही है। उन्होंने उल्लेख किया कि अपने विशिष्ट पोषणीय एवं औषधीय गुणों के कारण इस प्रजाति को ‘फूड–न्यूट्रास्यूटिकल’ की संज्ञा दी जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। कार्यक्रम के अंत में निदेशक डॉ. अनिल कुमार पूनिया ने विश्वास जताया कि इस कार्यशाला से निकले निष्कर्ष ऊँट पालकों के लिए वरदान साबित होंगे और राजस्थान के इस ‘राज्य पशु’ के संरक्षण को नई दिशा मिलेगी।
डॉ. ब्रह्मप्रकाश, पूर्व निदेशक, केन्द्रीय पशु अनुसंधान संस्थान, मेरठ ने कैमल ब्रीडिंग प्लान के बारे में उपयोगी सुझाव देते हुए कहा इस हेतु फील्ड से डाटा एकत्रण करते हुए इसे ब्रीडिंग प्लान में शामिल किया जाना चाहिए। डॉ. पवन सिंह, पूर्व प्रधान वैज्ञानिक, भाकृअनुप-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल ने कहा कि विकसित राष्ट्र ‘ग्रीन कॉन्फ्रेंस’ की अवधारणा को अपनाकर पर्यावरण-अनुकूल आयोजनों को बढ़ावा दे रहे हैं, अतः हमें भी प्लास्टिक के दैनिक उपभोग पर संयम बरतना होगा।
डॉ. संदीप मान, प्रभागाध्यक्ष एवं प्रधान वैज्ञानिक, सीआईपीएचईटी, लुधियाना ने कहा कि शीतलन पद्धति से खाद्य पदार्थों को अधिक सुरक्षित रखा जा सकता है, जो उनकी गुणवत्ता को बनाए रखने में सहायक है तथा ऊँट उत्पादों विशेषकर दूध की आपूर्ति-श्रृंखला में भी इस तकनीक का प्रभावी उपयोग किया जा सकता है। डॉ. सुनील कुमार खटकर, सहायक आचार्य, गड़वासु, लुधियाना ने डेयरी प्रौद्योगिकी के आधुनिक नवाचारों पर चर्चा करते हुए ऊंटनी के दूध में विद्यमान विशिष्ट गुणधर्मों की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि इसके प्रसंस्करण में पृथक एवं उपयुक्त तकनीकों का उपयोग आवश्यक है। डॉ. पंकज ढाका, सहायक आचार्य, गडवासु, लुधियाना ने विषयगत बात रखते हुए पशुजनित रोगों में विशेषकर ब्रुसेलोसिस की ओर ध्यान इंगित किया तथा एनआरसीसी के साथ एमओयू तहत कार्य करने की इच्छा जताई। डॉ. मोनिका पूनिया, उप निदेशक, भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण, नई दिल्ली ने भी विषयगत उपयोगी सुझाव देते हुए युवा वैज्ञानिकों को बेहतर प्रोजेक्ट प्रस्तुत करने, अधिदेश तैयार करने एवं विषय विशेषज्ञ, संबद्ध संस्थान आदि को जोड़ने की बात कही। कार्यशाला में डॉ. के.पी.एस.तोमर, एनडीआरआई, करनाल ने भी सहभागिता निभाई। पैनल चर्चा के दौरान संस्थान के वैज्ञानिकों ने ऊँट पालन, उपचार पद्धतियों एवं रोग प्रबंधन से संबंधित विभिन्न प्रश्न विशेषज्ञों के समक्ष प्रस्तुत किए तथा उनसे मार्गदर्शन प्राप्त किया। इस अवसर पर बायोटैक रिसर्च सोसायटी ऑफ इंडिया की ओर से केन्द्र निदेशक डॉ. अनिल कुमार पूनिया के अनुसंधान के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्यों एवं प्राप्त उपलब्धियों को देखते हुए सम्मानित किया गया। केन्द्र के प्रधान वैज्ञानिक एवं कार्यक्रम संयोजक डॉ. राकेश रंजन ने कार्यशाला के उद्देश्यों को रेखांकित किया। वही कार्यक्रम समन्वयक डॉ. श्याम सुंदर चौधरी ने कार्यशाला कार्यक्रम का संचालन किया। दोपहर पश्चात गहन विचार गोष्ठी में संस्थान की प्रौद्योगिकी, प्रदर्शन एवं इसके विकास संबंधी चर्चा की गई तथा विशेषज्ञों ने तकनीकी गतिविधियों का अवलोकन भी किया इस अवसर पर पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए पौधारोपण किया गया।
