











बीकानेर,राजनीति कितनी टयूची (ओछी) और नेता कितने स्वार्थी होते हैं। यह बात खेजड़ी कटाई के खिलाफ चल रहे महाअभियान में राजनीतिक पार्टियों और नेताओं की भूमिका से कोई भी सहज ही समझ सकता है। प्रकृति सब की मां है। न वे भाजपा के साथ पक्षपात करती और न कांग्रेस से। प्रकृति चक्र यानि ब्रह्मांड अपनी नियति से चलता है। ऐसे ही खेजड़ी, गोचर, जीव जंतु और समग्र प्रकृति सत्ता, सरकार, नेताओं से निष्प्रभावी रहती है। फिर राजनीति प्रकृति, पेड़ और जीव जंतुओं के साथ भेद क्यों करती है? कारण स्पष्ट है राजनीति और नेताओं के अपने स्वार्थ है। मरुस्थल में खेजड़ी प्रकृति चक्र की धुरी मानी गई है। यह कल्पतरू है। राज्यवृक्ष है। जनास्था से तुलसी तुल्य पूजी जाती है। वेद आदि ग्रंथों में इसकी महिमा गाई गई है। फिर जिम्मेदार बड़े भाजपा नेता चाहे देवी सिंह भाटी हो या अर्जुन राम मेघवाल या अन्य कोई खेजड़ी के मुद्दे पर जनास्था के साथ क्यों नहीं आए? यही भाजपा नेता अगर कांग्रेस की सरकार में खेजड़ी मुद्दे पर यह महा आंदोलन होता तो शायद सबसे आगे होते। आश्चर्य तो तब होता है जब खेजड़ी के गीत गाने वाले केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और परम्परा और प्रकृति के हिमायती करने वाले देवी सिंह भाटी सत्ता और भाजपा की सरकार के साथ खड़े होकर चुप्पी साधे हुए हैं। न खेजड़ी काटने के विरुद्ध महा आंदोलन के मंच पर आए न जनास्था की अनदेखी पर इन्होंने कोई अफसोस की अभिव्यक्ति की। हालांकि भाटी जरूर खेजड़ी कटाई के मुद्दे पर पहले आवाज उठा चुके। अब वे चुप्पी साधकर बैठ क्यों गए? अर्जुन राम मेघवाल तो खैर… । बाकी भाजपा नेता तो सत्य, न्याय, निष्पक्ष, जनहित से नहीं पार्टी के इशारों से बंधे है। सच कहना और जनहित में बोलना उनका काम नहीं है। यह काम तो विपक्ष है। भाजपा के बड़े नेताओं की जी हजूरी और पार्टी के निर्देश ही इनका राजनीतिक धर्म है। खेजड़ी, गोचर, अरावली, यूजीसी सब जाओ भाड़ में। भले ही सर्वोच्च न्यायालय संज्ञान लेकर अरावली में खनन पर रोक लगा दें, या यूजीसी पर रोक लगा दें या जन दवाब में सरकार गोचर को यथावत रखने के आदेश दे दें या फिर जनता के दवाब में ही अब खेजड़ी कटाई पर रोक का कड़ा कानून बनाने की बांसुरी बजाने लगे। दुर्भाग्य है कि राजनीति और नेता अपना हित_ अहित पहले देखते हैं। यहां तक कि प्रकृति को भी नहीं बख्शते। गोचर और खेजड़ी के मुद्दे पर जनता ने जो किया है वो राजनीति और नेताओं के मुंह पर तमाचा है। क्या तो साख बची है सरकार और नेताओं की?
