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बीकानेर,चैत्र मास की तीज यानि गणगौर तीज पर बीकानेर में महंगे आभूषणों से सजी गणगौर की सवारी निकली. गणगौर पर्व के मौके पर दो दिन तक बीकानेर में इस गणगौर के दर्शन होते हैं. इस गणगौर को चांदमल ढड्ढा की गणगौर के नाम से जाना जाता है. माना जाता है कि यह गणगौर पुत्र कामना की मुराद पूरी करती है.

भगवान शिव यानी गण और माता पार्वती यानी गौर के लिए मनाया जाता है. गणगौर पर्व में कन्या जीवन में मनपसंद वर पाने की कामना के साथ पूजन करती है. मान्यता है कि जिस महिला के संतान नहीं हो रही है. वह यहां भाव से अगर गणगौर से वरदान मांगती है तो उसकी मुराद पूरी होती है. यहां इस गणगौर की स्थापना सेठ चांदमल ढड्ढा ने की थी. इसे आज भी चांदमल ढड्ढा की गणगौर के नाम से जाना जाता है, हालांकि अब उनका परिवार कारोबार के ​चलते दुनिया भर के अलग-अलग हिस्सों में चला गया, लेकिन आज भी गणगौर के मौके पर परिवार के सदस्य यहां जरूर आते हैं. ढड्ढा चौक में सेठ चांदमल की हवेली पर गणगौर का मेला भरता है. सूरत प्रवासी और ढड्ढा परिवार के वंशज सुरेंद्र कहते हैं कि इस गणगौर का आशीर्वाद हमारे परिवार पर और बीकानेर पर भी है. जो लोग यहां अपने भाव से आते हैं, उनकी मुराद पूरी होती है. यह यह बात सारा शहर जानता है. सुरेंद्र ढड्ढा कहते हैं कि बड़ा अच्छा लगता है, जब इस गणगौर को हमारे पूर्वजों के नाम से जोड़ा जाता है. उन्होंने कहा कि यह हमारी आस्था से जुड़ी है.

150 साल से चली आ रही परंपरा

दरअसल, सेठ चांदमल का डेढ़ सौ साल पहले आभूषणों का बड़ा कारोबार था. अंग्रेजी हुकूमत में भी उनका दबदबा था. यहां तक कि कई रियासतों के राजाओं से पहले ब्रिटिश हुकूमत में उनको बैठने का स्थान मिला हुआ था. बताया जाता है कि वे जोधपुर से इस गणगौर को जीतकर लाए. उस समय आम आदमी गणगौर पूजा अपने घर पर उस राजसी ठाठ के साथ नहीं कर सकता था, लेकिन सेठ चांदमल ने उस वक्त इस गणगौर का हीरा, माणक और जड़ाऊ ज्वेलरी के आभूषणों से श्रृंगार करवाया और पूजन शुरू करवाया. तब से यह चांदमल ढड्ढा की गणगौर कहलाई. उस वक्त गणगौर को पहनाए गए सोने जवाहरात आज भी पहनाए जाते हैं, जो कि आज करोड़ों रुपए के हैं. गणगौर पर्व से एक दिन पहले इन आभूषणों को बैंक से लॉकर से बाहर निकाला जाता है और मेले के बाद वापस सुरक्षित लॉकर में रखा जाता है.

पुलिस के पहरे में निकलती है सवारी

रियासत काल के समय से बीकानेर के ढड्ढा चौक में चांदमल ढड्ढा की गणगौर एक अनूठी परंपरा के निर्वहन के साथ बाहर निकलती है. माता गवरजा हीर, जड़ाऊ सोने के महंगे जवाहरात को पहनती हैं. शाही गणगौर की सवारी के दौरान होने वाले सुरक्षा इंतजाम रियासत काल से राजाओं के समय से होते रहे हैं, लेकिन चांदमल ढड्ढा की गणगौर में आज भी पुलिस की कड़ी सुरक्षा-व्यवस्था देखने को मिलती है. गणगौर मेले की व्यवस्थाओं से जुड़े मनमोहन शर्मा कहते हैं कि यहां लोग अपनी भावना और श्रद्धा से आते हैं. श्रद्धा से आने वाले व्यक्ति की मुराद मां गवरजा पूरी करती है.

भाइया को गोद में लेकर मांगती हैं मन्नत

पुत्र कामना की मनोकामना को पूरा करने वाली चांदमल ढड्ढा की गणगौर के आगे समूह में महिलाएं नृत्य करती नजर आती हैं. माता गवरजा के साथ उनके पुत्र, जिन्हें भाइया कहा जाता है, पास में बैठे नजर आते हैं. वे देखने में किसी सेठ साहूकार जैसे नजर आते हैं. यहां पुत्र की कामना लेकर आने वाली महिलाएं भाइया को गोद में लेकर मन्नत मांगती है.

कोई बदलाव नहीं

डेढ़ सौ साल से भी पहले की गणगौर की प्रतिमा आज भी वैसे ही है जैसे उसे समय थी.चांदमल ढड्ढा के वंशज सुरेंद्र कहते हैं कि इन डेढ़ सौ सालो में आज तक गणगौर में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं किया गया है और ना ही कोई कलर या कोई और काम दोबारा कराया गया है. जैसे डेढ़ सौ साल पहले गणगौर थी ही वैसे ही आज है. यह भी अपने आप में एक बड़ी बात है.

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