













बीकानेर,देश में न्यायपालिका को आम नागरिक अंतिम उम्मीद के रूप में देखता है और उम्मीद रखता है कि न्याय मिलेगा, लेकिन होता क्या है कि न्याय प्रक्रिया इतनी लंबी हो जाती है कि न्याय की मांग करने वाले का जीवन ही समाप्त हो जाता है । इस प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है जब कुछ के लिये आधी रात को न्यायालय खुल जाते है और कुछ न्याय के लिये सूची में शामिल होने के बाद भी उस दिन सुनवाई ना होकर अगली तारीख दे दी जाती है । हाल के वर्षों में कई मामलों में यही देखा जा रहा है कि विशेषकर वरिष्ठ नागरिकों, पेंशनभोगियों और आम नागरिकों के मामलों में लगातार तारीख पर तारीख मिलती रहती है। स्थानीय स्तर पर यह सामान्यतः यही चल रहा है लेकिन यदि सर्वोच्च न्यायालय में भी ऐसा चलता है तो सवाल उठना वाजिब है । सुप्रीम कोर्ट ने सत्यपाल सिंह बनाम यूनियन आफ इंडिया 2009 का यह महत्वपूर्ण निर्णय है कि यदि का स्पष्ट संदेश यदि कोई पक्ष जानबूझकर देरी करता है या मुकदमे को लटकाता है तो उस पर लगाया गया जुर्माना लगाया जाए । यह फैसला केवल एक कानूनी तकनीकी बिंदु नहीं है, बल्कि यह न्याय के मूल सिद्धांत को मजबूत करता है, जो पीड़ित है, उसे ही राहत मिलनी चाहिए व देरी करने वालों को दंडित किया जाना चाहिए और न्याय प्रक्रिया को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए । सेवानिवृत बैंकर्स एम सी सिंगला केस में लाखों पेंशनभोगी वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं और अधिकतर पेंशनर्स 70-80 वर्ष की आयु पार कर चुके हैं, आर्थिक असुरक्षा और स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ रही हैं लेकिन हर सप्ताह किसी ना किसी वजह से तारीख ही पड़ रही है । सेवानिवृत बैंकर्स की हर तारीख के साथ उम्मीद कम और निराशा अधिक हो रही है । बैंकिंग सेक्टर ही एक ऐसा सेक्टर है जहां आज तक पेंशन संशोधन हुआ नहीं है, एक सेवानिवृत महाप्रबन्धक आज सेवानिवृत होने वाले अधिकारी से कम पेंशन प्राप्त कर रहा है । जहां केन्द्र सरकार व राज्य सरकारें नियमित अंतराल पर वेतन आयोजग के पेंशन में भी संशोधन करती वहीं बैंकिंग सेक्टर में जो पेंशन स्वीकृत हुई उसी मूल पेंशन पर ही पेंशन दी जा रही है । इन पीड़ितों के पास केवल सर्वोच्च न्यायालय का ही सहारा है लेकिन हर बार की तरह 7 मई को सुनवाई पूरी ना करते हुए अगले सप्ताह की 13 मई की नई तारीख दे दी गई है ।
