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बीकानेर,राजस्थान पशुचिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, बीकानेर के प्रसार शिक्षा निदेशालय और निदेशालय गोपालन, राजस्थान, जयपुर के संयुक्त तत्वावधान में पंजीकृत गौशालाओं के प्रबंधकों एवं डेयरी संचालकों का तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का बुधवार को समापन हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. एस.के. शर्मा, सहायक महानिदेशक (आई.सी.ए.आर.) ने डेयरी संचालकों एवं प्रबंधकों से अपने विचार साझा करते हुए कहा कि डेयरी व्यवसाय एवं गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने हेतु गौशालाओं का यंत्रीकरण एवं डिजिटल रूपांतरण किया जाना चाहिए, ताकि गौशालाओं के उत्पादन एवं लागत की सूचनाओं का संधारण समय-समय पर किया जा सके। डॉ. एस.के. शर्मा ने कहा कि गौशालाओं को “स्वयं टिकाऊ मॉडल” आधारित बनाने एवं अपनाने की जरूरत है ताकि गौशालाएं दान-दाताओं और सरकार पर कम से कम निर्भर हो सके। डॉ. एस.के. शर्मा ने गौशालाओं को प्राकृतिक खेती के साथ जोड़ने की बात भी कही। वेटरनरी विश्वविद्यालय के के कुलगुरु डॉ. सुमंत व्यास ने कहा कि देशी गौवंश ने संरक्षण एवं सवर्धन भी आज महत्ती आवश्यकता है। गौशाला प्रबंधक गौवंशो के संरक्षण का कार्य कर रहे है लेकिन वैज्ञानिक तकनीकों और उपयुक्त ईलाज के माध्यम से गौवंश की उत्पादकता बढ़ानी चाहिए। कुलगुरु डॉ. सुमंत व्यास ने गौशालाओं में रिकॉर्ड संधारण तथा कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से स्वावलंबी बनाने हेतु सुझाव दिये। वेटरनरी महाविद्यालय, बीकानेर के अधिष्ठाता प्रो. बी.एन. श्रृंगी ने कहा कि गाय के दुग्ध के अलावा गोबर, गोमूत्र की भी बहुत मांग है। गौवंश उत्पादों के मूल्य सवंर्धित करके गौशालाओं को टिकाऊ और आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। निदेशक प्रसार शिक्षा प्रो. राजेश कुमार धूड़िया ने बताया कि तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में बीकानेर, हनुमानगढ़ एवं श्रीगंगानगर जिले के पंजीकृत गौशालाओं के प्रबंधको, डेयरी संचालक एवं प्रतिनिधियों को विशेषज्ञों द्वारा राज्य की गौवंश की विभिन्न नस्लों, पशुओं में नस्ल सुधार, दूध उत्पादन बढ़ाने के तरीकों, पंचगव्य के औषधीय गुणों और उसके व्यावसायिक उपयोग और साल भर हरा चारा उपलब्ध कराने की तकनीक पर विस्तार से जानकारी दी गई।  प्रशिक्षको को जिले की गौशालाओं एवं विश्वविद्यालय के पशु अनुसंधान केन्द्रों का भ्रमण भी करवाया गया। प्रशिक्षण के दौरान “प्रशिक्षण संदर्शिका“ का विमोचन भी किया गया। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के समन्वयक अतिरिक्त निदेशक प्रसार डॉ. देवीसिंह रहे। प्रशिक्षण उपरान्त प्रशिक्षार्थियों को प्रमाण-पत्र वितरित किये गये।

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