











बीकानेर,आज पेश हुआ बजट सिर्फ़ आंकड़ों और घोषणाओं का दस्तावेज़ नहीं था, बल्कि यह देश के आम आदमी, मेहनतकश वर्ग और ज़मीनी हकीकतों की तस्वीर भी पेश करता दिखा। एक फोटो जर्नलिस्ट के रूप में बजट को सुनते हुए मेरी नज़र उन चेहरों पर टिक गई, जो अक्सर मेरी कैमरा फ्रेम में आते हैं—किसान, मज़दूर, छोटे व्यापारी, छात्र और महिलाएँ।
बजट भाषण के दौरान उम्मीद और आशंका दोनों भाव साफ़ दिखाई दिए। कुछ वर्गों के लिए राहत की घोषणाएँ थीं, तो कुछ चेहरे अब भी जवाब ढूंढते नज़र आए। मेरे लिए यह बजट केवल शब्दों का नहीं, बल्कि प्रतिक्रियाओं का बजट था—कहीं मुस्कान, कहीं खामोशी और कहीं सवालों से भरी आँखें।
कैमरा भले ही तस्वीर कैद करता है, लेकिन बजट के दिन असली तस्वीर समाज के मन में बनती है। आज का बजट विकास और संतुलन की बात करता है, अब देखना यह है कि आने वाले दिनों में ये घोषणाएँ ज़मीनी तस्वीरों में कितनी बदल पाती हैं।
