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बीकानेर,नाल ,खेजड़ी (Prosopis cineraria) थार मरुस्थल का अत्यंत महत्वपूर्ण एवं बहुउपयोगी वृक्ष है, जिसे राजस्थान की मरुस्थलीय संस्कृति, आजीविका और पर्यावरण का आधार माना जाता है। यह वृक्ष अत्यधिक तापमान, कम वर्षा तथा रेतीली एवं क्षारीय मिट्टियों जैसी कठोर परिस्थितियों में भी सफलतापूर्वक जीवित रहता है। इसकी गहरी जड़ प्रणाली मिट्टी की नमी को संरक्षित करने के साथ-साथ भूमि की उर्वरता बढ़ाने में सहायक होती है। यही कारण है कि खेजड़ी को मरुस्थल का “कल्पवृक्ष” तथा “पवित्र वृक्ष” कहा जाता है। यह वृक्ष मनुष्य एवं पशुओं दोनों के लिए भोजन, चारा, ईंधन तथा पर्यावरण संरक्षण का प्रमुख स्रोत है। इसकी कोमल फलियाँ, जिन्हें “सांगरी” कहा जाता है, राजस्थान के प्रसिद्ध व्यंजन “केर-सांगरी” एवं “पंचकुटा” का मुख्य घटक हैं और वर्तमान में अपने उच्च पोषणीय एवं औषधीय गुणों के कारण देश-विदेश में लोकप्रिय हो चुकी हैं।

खेजड़ी मरुस्थलीय क्षेत्रों में भोजन, चारा, ईंधन, औषधि तथा पर्यावरणीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार है। इसकी पत्तियाँ (लूंग/लूम), कोमल फलियाँ (सांगरी), बीज एवं लकड़ी ग्रामीण जीवन और पशुपालन की आधारशिला मानी जाती हैं। खेजड़ी की नाइट्रोजन स्थिरीकरण क्षमता मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में सहायक होती है, जिससे खेतों की उत्पादकता में वृद्धि होती है। किसानों का मानना है कि खेजड़ी की उपस्थिति से भूमि में जैविक पदार्थ, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं कैल्शियम की मात्रा बढ़ती है तथा मिट्टी का pH संतुलित रहता है। इसके वृक्षों पर प्रचुर मात्रा में फूल आते हैं, जो मधुमक्खी पालन एवं शहद उत्पादन के लिए भी अत्यंत उपयोगी हैं। भारतीय संस्कृति एवं परंपरा में भी खेजड़ी का विशेष धार्मिक महत्व है। वैदिक काल में इसकी लकड़ी यज्ञ अग्नि प्रज्वलित करने हेतु उपयोग की जाती थी तथा रामायण और महाभारत में “शमी पूजा” के रूप में इसका उल्लेख मिलता है। वर्ष 1730 में अमृता देवी बिश्नोई एवं 363 ग्रामीणों द्वारा खेजड़ी वृक्षों की रक्षा हेतु दिया गया बलिदान आज भी पर्यावरण संरक्षण का अनुपम उदाहरण माना जाता है।

मरुस्थल में यह कहावत प्रचलित है कि “जिस व्यक्ति के पास खेजड़ी, ऊँट और बकरी है, उसे अकाल में भी भूख का सामना नहीं करना पड़ता”, क्योंकि ये तीनों जीवन निर्वाह का आधार माने जाते हैं। खेजड़ी की हरी एवं सूखी पत्तियाँ पशुओं के लिए अत्यंत पौष्टिक चारा हैं, जबकि कच्ची सांगरी का उपयोग सब्जी, अचार एवं सुखाकर लंबे समय तक किया जाता है। पकी फलियाँ (खोखा) मीठे गूदे एवं प्रोटीन युक्त बीजों के कारण “मारवाड़ी मेवा” के रूप में प्रसिद्ध हैं तथा इनका उपयोग आटा एवं बेकरी उत्पादों में भी किया जाता है। पोषण की दृष्टि से इसकी पत्तियों में 12-18% प्रोटीन, 43-45% कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, फॉस्फोरस एवं सूक्ष्म खनिज तत्व पाए जाते हैं, जबकि फलियों में लगभग 18% प्रोटीन एवं 56% कार्बोहाइड्रेट होता है। इसके अतिरिक्त इसकी छाल, गोंद एवं पत्तियों का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा में खाँसी, दमा, पेचिश, त्वचा रोग, साँप एवं बिच्छू के काटने तथा सूजनरोधी उपचारों में किया जाता है। इसकी लकड़ी उच्च ऊष्मा मान (लगभग 5000 kcal/kg) वाली उत्कृष्ट ईंधन एवं कोयला निर्माण सामग्री मानी जाती है तथा इसका उपयोग कृषि उपकरण, मकान निर्माण, बाड़बंदी एवं फर्नीचर निर्माण में भी किया जाता है। इस प्रकार खेजड़ी केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि मरुस्थलीय पारिस्थितिकी, पोषण सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था एवं पर्यावरणीय संतुलन की जीवनरेखा है।

उन्नत किस्में एवं प्रवर्धन तकनीक

खेजड़ी में प्राकृतिक रूप से अत्यधिक आनुवंशिक विविधता पाई जाती है, जिसके आधार पर ICAR-Central Institute for Arid Horticulture द्वारा “थार शोभा (KS-1)” जैसी उन्नत किस्मों का विकास किया गया। ये किस्में कांटारहित, अधिक सांगरी उत्पादन देने वाली तथा शीघ्र फलन वाली हैं। खेजड़ी का प्रवर्धन मुख्यतः बीज द्वारा होता है, किंतु समान गुणों वाले पौधे प्राप्त करने के लिए पैच बडिंग अथवा बड ग्राफ्टिंग तकनीक सर्वाधिक सफल सिद्ध हुई है। 7-15 माह पुराने रूटस्टॉक पर मार्च से अक्टूबर तक बडिंग करने पर लगभग 75-90 प्रतिशत सफलता प्राप्त होती है। बड ग्राफ्टेड पौधे 3-4 वर्ष में फल देना प्रारंभ कर देते हैं, जबकि बीज से तैयार पौधों में फलन आने में अधिक समय लगता है।गॉल समस्या एवं प्रबंधन उपायः हाल के वर्षों में सांगरी बनने की प्राकृतिक प्रक्रिया अर्थात् कली से फूल, फूल से फली और अंततः भोजन तक पहुँचने की श्रृंखला-एक विचित्र जैविक घटना के कारण बाधित होने लगी है। इस प्रक्रिया में सामान्य फलियों के स्थान पर गाँठ जैसी असामान्य संरचनाएँ विकसित हो जाती हैं, जिन्हें “गॉल” कहा जाता है। वास्तव में यह एक जटिल एवं दुर्भाग्यपूर्ण प्रक्रिया है, जो किसानों को खेजड़ी से होने वाली आय से वंचित कर देती है। सामान्यतः गॉल पौधों की कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि के कारण बनते हैं और ये पत्तियों, टहनियों, फूलों तथा जड़ों पर विकसित हो सकते हैं। अधिकांश गॉल कीटों-जैसे मिज, ततैया एवं घुन द्वारा भोजन करने या अंडे देने के परिणामस्वरूप उत्पन्न होते हैं, जबकि कुछ गॉल बैक्टीरिया, कवक अथवा सूत्रकृमियों के संक्रमण के कारण भी बन सकते हैं। खेजड़ी में गॉल बनने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल है, जिसमें फूल आने के तुरंत बाद परिवर्तन प्रारंभ हो जाता है तथा धीरे-धीरे फूल गॉल में और फिर गॉल के गुच्छों में परिवर्तित हो जाते हैं। समय के साथ पूरा वृक्ष संक्रमित हो सकता है और ये गॉल अन्य जीवों के लिए भी आश्रय स्थल बन जाते हैं।फलियाँ 10-15 दिन की अवस्था में ही उपयोग के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं, इसलिए नियंत्रण उपायों के लिए समय बहुत सीमित होता है। यदि रासायनिक नियंत्रण अपनाया जाए, तो उसका उपयोग फूल आने से पूर्व करना आवश्यक होता है, अन्यथा परागण करने वाले उपयोगी कीट प्रभावित हो सकते हैं, जो फली निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। वर्तमान में खेजड़ी में गॉल निर्माण से संबंधित वैज्ञानिक प्रमाण अभी भी सीमित हैं तथा कीट एवं पौधों के बीच होने वाली जटिल पारस्परिक क्रियाओं को पूरी तरह समझा नहीं जा सका है। फिर भी किसानों के लिए कुछ पर्यावरण-अनुकूल उपाय उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं, जैसे जून माह में वृक्षों की वैज्ञानिक छंटाई करना, संक्रमित शाखाओं एवं अवशेषों को जलाकर नष्ट करना, वृक्ष के छत्रक के नीचे मिट्टी की हल्की खुदाई करना तथा फूल आने से पूर्व अनुकूल मौसम में पर्यावरण-अनुकूल कीटनाशकों का सावधानीपूर्वक छिड़काव करना।
केंद्रीय शुष्क बागवानी केंद्र के निदेशक जगदीश राणे ने बताया यह समस्या थार क्षेत्र की पारंपरिक सांगरी उत्पादन प्रणाली के लिए एक गंभीर चुनौती बनती जा रही है। खेजड़ी में बनने वाली गॉल की समस्या, के लिए केंद्रीय शुष्क बागवानी केंद्र में अनुसन्धान चल रहा है ओर इस वर्ष बागवानी केंद्र में लगे सभी खेजड़ी के पेड़ों पर सांगरी लगी है ,आम ग्रामीण ओर किसान हमारे अनुसन्धान केंद्र से इसकी जानकारी लेकर फायदा उठा सकते है ,खेजड़ी में गाल,/गांठ/ का समाधान हेतु केंद्रीय शुष्क बागवानी केंद्र के यु ट्यूब पर भी किसानों को मिल सकता है https://www.youtube.com/watch?v=iULMjt2M4aA

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