











बीकानेर,शहर में दिनभर अक्षय तृतीया पर हुई पतंगबाजी लू और तेज धूप को दरकिनार कर लोग छतों पर डटे रहे। शाम चार बजे बाद पूरा शहर ही छतों पर नजर आया। सड़कें और मुख्य बाजारों में सन्नाटा रहा।सुबह मौसम खुशनुमा होने से पतंगबाजों में जबर्दस्त उत्साह रहा। हलांकि हवा का रूख बदलता रहा,लेकिन दोपहर बाद आसमान फिर सतरंगी पतंगों से अट गया। देर शाम तक लोग पतंगबाजी करते रहे और बाद में आतिशबाजी भी की। सुबह घरों में खीचड़ा व आमली का भोजन किया गया।शहर में युवाओं के साथ हर आयु वर्ग के लोग भी पतंग उड़ाने के लिए सुबह ही छतों पर जा डटे। उन्होंने छतों पर लाउड स्पीकर,डीजे पर गीतों के साथ पतंगबाजी का लुत्फ उठाया। लोग फिल्मी गानों और मारवाड़ी गीतों पर झूमते नजर आए। बच्चों में पतंगबाजी को लेकर जबर्दस्त उत्साह रहा। जब लोग छतों पर पेंच लड़ा रहे थे,तो दूसरी ओर कुछ युवा व बच्चें कटी हुई पतंगों को लूटने में लगे रहे। उन्हें तेज धूप,लू व गर्मी की कोई परवाह नहीं थी।महिलाओं ने उत्साह के साथ पतंगबाजी की। गर्मी और लू से बचने के लिए पतंगबाजों ने आमली का सेवन किया। साथ ही नींबू की शिकंजी,शर्बत,शीतल पेय से गला तर किया। खीचड़े का स्वाद लेने के बाद आइसक्रीम,चाट-पकौड़ों का लुत्फ उठाया। अक्षय तृतीया पर परकोटे में में चंदा उड़ाने की परम्परा निभाई गई। पतंगबाजों ने गवरा दादी पून दे, टाबरियां रा चंदा उड़े,’आकाशा में उडेम्हारों चंदा,लखमीनाथ म्हारी सहाय करै’सहित अन्य दोहों का गायन कर नगर सुख,समृद्धि और खुशहाली की कामना की। संस्थापक राव बीकाजी ने चंदा उड़ाकर शहर की नींव रखी थी। तभी से परपरा चली आ रही है। यहां दो दिन पतंगबाजी परवान पर है। बॉय काट्यो के गूंज के बीच छतों पर लगे स्पीकरों में बीकानेर स्थापना और आखातीज से जुड़े गीत गूंजते रहे। इस पर चित्रों,दोहों और लोक श्लोकों के माध्यम से बीकानेर की संस्कृति को दर्शाया गया। चंदा का पूजन कर उसे जूनागढ़ प्रांगण और घरों की छतों से उड़ाया गया। हर घर की रसोई में खीचड़ा और इमलाणी का व्यंजन परोसा गया। इसके साथ शीतल पेयों और व्यंजनों का दौर दही-लस्सी,बेले का शर्बत, कोल ड्रिक,कचोड़ी,समोसे,दही बड़े,भुजिया और मिठाइयों की खुशबू वातावरण ने माहौल को और रसमय बना दिया। नगर स्थापना दिवस पर होने वाली पतंगबाजी को लेकर शहर में पतंग-मांझा की दुकानों पर रविवार को देर रात तक खरीदारी चलती रही।बच्चों से बुजुर्गो तक ने पतंगबाजी के लिए पतंग-मांझा की खरीदारी की। पुराने शहर के गली-मौहल्लों से लेकर शहर के मुख्य बाजारों,परकोटा क्षेत्र से बाहरी क्षेत्रों व कॉलोनियों आदि में संचालित पतंग मांझों की दुकानों पर पतंग,माझां,लटाईया आदि की बिक्री चलती रही।पतंगों के शौकीनों का ही कमाल है कि बीकानेर शहर में स्?थापना दिवस के दो दिन के समारोह के दौरान ही लगभग 10 करोड़ रूपये की पतंग व मांझा बिकने का कारोबार हो जाता है। नगर स्थापना दिवस पर हर घर में पानी की मटकी का पूजन किया गया व हांडी में इमलाणी तैयार की। स्थापना दिवस को लेकर शहर के विभिन्न बाजारों में मिट्टी से बनी मटकियां,हांडी,लोटड़ी,ढक्कनी,सर्वा आदि की बिक्री परवान पर रही। बड़ा बाजार,सार्दुल सिंह सर्कल,जस्सूसर गेट,गंगाशहर सहित विभिन्न क्षेत्रों में दिनभर मिट्टी के बर्तनों की खरीदारी चलती रही। वहीं परचून की दुकानों पर गेंहू,बाजरा का खीचडा, मूंग, देशी घी, कालीमिर्च, इलायची, काचरी, बडी आदि की खरीदारी हुई।
व्यापारियों ने अपने प्रतिष्ठान बंद रखे। केवल जरूरत के सामान की दुकानें ही खुली रही। जिसके चलते सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा।लेकिन सड़कों पर पतंगों के लुटरे पतंग लूटते नजर आएं। हालांकि चायनीज मांझे पर प्रतिबंध है मगर गैर कानूनी रूप से इसके विक्रेता और खरीददार दोनों ही बड़ी मात्रा में अपना काम कर जाते हैं।जिसके कारण बड़ी मात्रा में प्रतिबंधित मांझा खूब बिका। जिसके परिणाम स्वरूप करीब 200 से ज्यादा लोग इस मांझे की चपेट में आकर घायल हुए। वहीं बेजुबान पशु पक्षी भी इसका शिकार हुए। प्रशासन ने नौनिहाल की मौत के बाद महज दिखावें के तौर पर दो तीन जगह कार्रवचाई कर इतिश्री कर ली।.बीकानेर में पहले की तुलना में अब पतंगबाजी कम हो गई है। एक वक्त ऐसा भी था जब बीकानेर में पतंगबाजी सप्ताहभर तक होती थी। अब बदले समय में पतंगबाजी दो दिन में सिमटकर रह गई है। कुछ साल पहले तक आखातीज से कुछ पहले तक लोग पतंगबाजी की प्रतियोगिता करते थे। घरों पर ही लड़त (प्रतियोगिता) होती थी लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं। प्रोफेशनल पतंगबाजी ही अब ऐसे आयोजनों में हिस्सा लेते हैं।
