












श्रीकोलायत (बीकानेर),पश्चिम राजस्थान के प्रयाग और 68 तीर्थों के गुरु माने जाने वाले ऐतिहासिक कपिल सरोवर की स्थिति आज ‘दीपक तले अंधेरा’ वाली हो गई है। जिस पावन धरा पर महर्षि कपिल ने सांख्य दर्शन का प्रतिपादन किया, वह आज प्रशासनिक उपेक्षा, जलीय खरपतवार (कमल बेल) और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही है। करोड़ों के राजस्व और ‘सौंदर्यकरण’ के दावों के बीच, धरातल पर केवल बदहाली और दुर्गंध शेष है।
52 घाटों का गौरव, 40 से अधिक हुए अनुपयोगी
कपिल सरोवर की पहचान इसके भव्य 52 घाटों से है, लेकिन वर्तमान में इनमें से 40 से अधिक घाट केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं। पंच मंदिर से लेकर तहसील और गुरुद्वारा परिक्रमा मार्ग तक के घाटों पर कमल बेल और झाड़ियों का ऐसा साम्राज्य है कि वहां पैर रखना भी खतरे से खाली नहीं है। कचरे के अंबार और गाद के कारण श्रद्धालु न तो सुरक्षित स्नान कर पा रहे हैं और न ही पूजन।
जलीय वनस्पतियों का जाल और स्वच्छता पर संकट
सरोवर में बेतहाशा बढ़ी कमल बेल न केवल पानी को प्रदूषित कर रही है, बल्कि इससे उठने वाली तीव्र दुर्गंध ने श्रद्धालुओं का खड़ा होना दूभर कर दिया है।
अस्थायी समाधान: पूर्व में मशीनों से सफाई के प्रयास हुए, लेकिन वे केवल औपचारिकता सिद्ध हुए।
धार्मिक आयोजन: आगामी रामदेवरा मेला और कार्तिक पूर्णिमा को देखते हुए श्रद्धालुओं में भारी रोष है।
सुरक्षा के नाम पर ‘अंधेरा’, सीसीटीवी पड़े ठप
हजारों की भीड़ वाले इस संवेदनशील तीर्थ पर सुरक्षा व्यवस्था राम भरोसे है। पूर्व में हुई लूटपाट और चेन स्नेचिंग की घटनाओं के बावजूद प्रशासन नहीं जागा है। भामाशाहों के सहयोग से लगाए गए सीसीटीवी कैमरे लंबे समय से बंद हैं, जिससे अपराधियों के हौसले बुलंद हैं।
खनन से करोड़ों की आय, पर सरोवर को ‘फूटी कौड़ी’ नहीं?
क्षेत्र में संचालित सफेद मिट्टी और बजरी की खदानों से सरकार को प्रतिवर्ष करोड़ों का राजस्व मिलता है। नियमानुसार, DMFT (District Mineral Foundation Trust) फंड का एक हिस्सा स्थानीय विकास पर खर्च होना चाहिए।
“सरोवर की सफाई के लिए प्रतिवर्ष 15 लाख रुपये के बजट की चर्चा तो होती है, लेकिन वह बजट कहां खर्च हो रहा है, यह जांच का विषय है। धरातल पर न तो नियमित सफाई है और न ही कोई स्थायी योजना।” — स्थानीय निवासी
मछलियों का आतंक और आवक मार्गों में अवरोध
सरोवर में मछलियों की संख्या अनियंत्रित होने से स्नान के दौरान दुर्घटनाओं का भय बना रहता है। वहीं, सरोवर में पानी आने के दो प्रमुख मार्ग (गुरुद्वारा पुल और टेचरी मड कोटड़ी पायतन) खनन माफियाओं और प्रशासनिक अनदेखी के कारण अवरुद्ध हो रहे हैं। खनन विभाग को कई बार शिकायत के बावजूद केवल फाइलों में जांच चल रही है।
प्रशासनिक चुप्पी पर उठे सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता दिलीप सिंह राजपुरोहित ने इस मुद्दे पर तीखा प्रहार करते हुए कहा:
“कपिल सरोवर केवल एक जल निकाय नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। वर्षों से इसकी घोर अनदेखी की जा रही है। यदि प्रशासन ने शीघ्र ही सफाई, सुरक्षा और सौंदर्यकरण के लिए कोई ठोस कार्ययोजना लागू नहीं की, तो यह ऐतिहासिक धरोहर केवल इतिहास के पन्नों तक सिमट कर रह जाएगी।”
प्रमुख मांगें:
विशेष अभियान: तत्काल प्रभाव से कमल बेल और जलीय वनस्पतियों को जड़ से साफ किया जाए।
घाटों का पुनरुद्धार: अनुपयोगी पड़े 40 घाटों की मरम्मत और सफाई हो।
सुरक्षा बहाली: सीसीटीवी कैमरों को चालू किया जाए और विद्युत व्यवस्था सुधारी जाए।
मार्ग अवरोध मुक्ति: पानी की आवक के रास्तों से अतिक्रमण और अवरोध हटाए जाएं।
निष्कर्ष:
चुनाव आते हैं, वादे होते हैं और योजनाएं बनती हैं, लेकिन कपिल सरोवर की स्थिति नहीं बदलती। अब देखना यह है कि क्या जिला प्रशासन कुंभकर्णी नींद से जागकर इस पावन तीर्थ की मर्यादा बचाएगा या फिर आस्था ‘प्रशासनिक चुप्पी’ के मलबे में दबती रहेगी।
