











बीकानेर,गंगाशहर में आज शान्तिनिकेतन सेवा केन्द्र में साध्वी लब्धियशा जी ने प्रवचन देते हुए कहा कि जैन साधना पद्धति में साधना का आधार आगम है। आगम एक पवित्र ग्रंथ है। आगम का पहला अक्षर है – आ अर्थात् आप्तपुरुषों की वाणी। श्वेताम्बर परम्परा के अनुसार तीर्थंकर भगवान देशना देते हैं। आप्त वाणी अगाध गम्भीर है। उसके विशाल उदर में अमाप्य रत्न छुपे हुए हैं। कोई गोताखोर ही उन रत्नों को प्राप्त कर सकता है। आप्तवाणी पुष्कल मेघ के समान असरदार होती है। एक बार भगवान की देशना सुन हजारों-हजारों लोग 12 व्रती एवं महाव्रती बन जाते हैं। कहा जाता है जो एक बार भगवान की साक्षात् वाणी सुन लेता है, वह सात जन्मों तक बहरा नहीं होता है। एक बार भगवान को साक्षात् देख लेता है, वह सात जन्मों तक अन्धा नहीं होता।
आगम का दूसरा अक्षर है – ग अर्थात् गणधरों द्वारा गुम्फित। भगवान की वाणी को गणधर सूत्रों में पिरोते हैं। गणधर भी पावरफूल होते हैं क्योंकि वे तीर्थंकरों की वाणी का पान किए होते हैं। आ. सुधर्मा की देशना सुन जम्बू वैरागी बन गया। शादी की पहली रात वैराग्य की पहली रात बन गई। उनके साथ अनेक भवी जीव संयम पथ पर बढ़े। बछड़ा गाय की दूध पीता है उसमें जितना स्वाद व शक्ति होती है वह पात्र में लेकर पिलाने में नहीं होती। कारण बाहर से अनेक दोष, विजातीय कीणु मिल जाते हैं।
आगम का तीसरा अक्षर है – म। मुनियों द्वारा चिंतन मंथन किया गया। मुनियों की साधना का आधार ही आगम होता है। आगम स्वाध्याय, आगम मंथन से ही मुनियों की दिनचर्या शुरू होती है। मुनि के लिए कहा गया – प्रथम प्रहर में ध्यान, द्वितीय प्रहर में स्वाध्याय।
तृतीय प्रहर में आहार व चौथे प्रहर में पुनः स्वाध्याय करें। इतिहास साक्षी है – आचार्य प्रभव ने उत्तराधिकारी की खोज में प्रकाण्ड विद्वान शय्यंभव, वेदों के ज्ञाता, महान अहंकारी, निर्ग्रन्थ धर्म के प्रबल विरोधी को भी मात्र एक वाक्य ने उनकी जीवन धारा बदल दी। दो श्रमणों ने द्वार पर उच्चारित किया – “अहो कष्टं अहो कष्टं तत्त्वं विझायते न हि” अहो! खेद की बात है, तत्त्व नहीं समझा जा रहा है। महाभिमानी विद्वान शय्यंभव के मस्तिष्क में यह वाक्य घूमने लगा और मुनियों के पदचिह्नों पर आचार्य प्रभव के चरणों में पहुँच गया। अमृतवाणी सुन संयम पथ स्वीकार कर लिया।
जीवोंन्त मेघ भी एक बार बरसता है तो 100 साल तक भुमि में पानी की, उपजाऊ पन की कमी नहीं होती इसीप्रकार
गणधर भी बहुत पावर फुल होते है। उनकी देशना का प्रभाव भी 100 साल तक रहता है।
हर कोई मुनि में 14 पूर्वी ज्ञान नही होता है। आचार्य बनने के लिए भी बहुत सी योग्यता ओर विशेषताएं जरूरी होती है। आचार्य का एक दायित्व यह भी होता है कि वह अपने उतराधिकारी का चयन करना, उसे तैयार करना, योग्य बनाना।
कार्यक्रम में साध्वी श्री गौरव प्रभा जी ने प्रवचन प्रारम्भ करते हुए भी अपने विचार व्यक्त किये।
सभा के उपाध्यक्ष पवन छाजेड़ ने आगामी कार्यक्रमों की जानकारी प्रदान की।
