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बीकानेर, गंगाशहर सेवा केन्द्र शान्तिनिकेतन में विराजित रही   साध्वी मनुयशा जी (लाछुड़ा ) जी की स्मृति सभा दिनांक 14  जनवरी, 2026 , बुधवार को व्याख्यान उग्र विहारी तपोमूर्ति मुनि श्री कमल कुमार जी स्वामी एवं सेवा केन्द्र व्यवस्थापिका साध्वी श्री विशदप्रज्ञा जी एवं साध्वी श्री लब्धियशा जी की सान्निध्य में शान्तिनिकेतन सेवा केन्द्र में आयोजित हुई। आचार्य श्री महाश्रमण जी की सुशिष्या साध्वी श्री मनुयशा जी कल मंगलवार को देहावसान (अंरिहत शरण) हो गई थी। स्मृति सभा में बोलते हुए उग्र विहारी तपोमूर्ति मुनि श्री कमल कुमार जी स्वामी ने कहा कि आत्मा ही सर्वश्रेष्ठ है। आत्मा को पाप कर्मों से सुरक्षित रखना बहुत जरूरी है। आत्म दर्शी बनों अन्तर दृष्टि का जागरण होने से ही भव भव के जीवन मरण के चक्र को कम किया जा सकता है।
साध्वी श्री मनुयशा जी ने जिस मुमुक्षा भाव से, वैराग्य भाव दीक्षित हुई थी उस वैराग्य भावना को ओर अधिक बढाया। मुनि श्री ने दोहों के माध्यम से भी अपने विचारों की अभिव्यक्ति प्रदान की।
साध्वी विशद्प्रज्ञाजी ने अपनी श्रद्धा अभिव्यक्त करते हुए कहा कि उनमें  सेवा केन्द्र की व्यवस्थाओं का अच्छा ज्ञान था। हर कोई नये सेवा गुरूप के लिए अच्छी सलाहकार बनी हुई थी। उनमें करूणा का भाव था। अपनत्व ओर प्रमोद भावन से सबको प्रभावित किया। उनकी आत्मा के मोक्षगामी बनने की कामना की
इस अवसर पर साध्वी श्री लब्धियशा जी ने कहा कि साध्वी श्री मनुयशा जी में आत्मियता ओर वात्सल्य भाव बहुत अच्छा था।  काफी वर्षों से रूग्णवस्था में थी फिर भी शारीरिक कष्टों को धेर्य ओर समता के साथ सहन किया।
साध्वी श्री ने कहा कि वीर भूमि मेवाड़ से थी। इस संयम जीवन में भी भी विरागंना का वीरोचित भावना का परिचय दिया। अंत समय में कोई भी चिकित्सा सम्बंधित सेवा नही लेकर दृढ़ मनोबल का परिचय दिया।

इस स्मृति सभा में साध्वी श्री मनुयशा जी के सह दीक्षित साध्वी श्री मननयशा जी ने अपने वर्षों के सम्बन्धों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें नियमों के प्रति गहरी निष्ठा थी। अपनी साध्वीचर्या के प्रति पूर्ण जागरूक रही। खत्म अनुशासन था। बाहर से कठोरता लगती थी लेकिन ह्रदय में बहुत करूणा थी। अपने भावों को गीतिका के माध्यम से प्रस्तुति दी।
साध्वी श्री धुव्ररेखा जी ने कहा कि जो संयमी होता है, जो जितेन्द्रिय होता है उसका मरण भी प्रसस्त होता है। जो साधक होता है वह अपने आप में जीना जानता है,और अंतिम समय में भी उच्च मनोबल और समता से मौत से भी नही घबराते। साध्वी मनुयशा जी ने ऐसा जीवन जीकर, मृत्यु से नहीं घबराकर एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।
साध्वी श्री मंदारप्रभा जी ने कहा कि मैंने मृत्यु के क्षण को तीन बार नजदीक से देखने का अवसर मिला। साध्वी श्री मनुयशा जी के भी अंतिम समय में मुझे पास रहने का मौका मिला। इस जीवन की अंनत काल की यात्रा को शुद्ध साधु जीवन से कुछ काल तक में सीमित किया जा सकता है।
साध्वी श्री मनुयशा जी ने जीवन मरण की यात्रा पर अंकुश लगाने का प्रयास किया। उनका संयम जीवन बहुत अच्छा था। कोई भी कठोर बात को मधुरता से समझा देते थे। अनुशासन प्रिय थे। स्वच्छता पंसद थी।
स्मृति सभा में जैन लूणकरण छाजेड़ ने कहा कि अपने अंतिम समय की रात्रि में सभी कार्यकर्ताओं से व्यक्तिशः खमतखामना करके अपने जीवन को हल्का किया। उन्होंने कहा की आचार्य महाप्रज्ञ ने इस सेवाकेन्द्र के शुभारंभ के समय कहा था कि यह केन्द्र स्वास्थ्य चेतना का केन्द्र  बने।  सभा के मंत्री  जतनलाल संचेती, किशन बैद, रोहित, मनीष , प्रेम बोथरा ने साध्वी  मनुयशा जी की आत्मा के प्रति मंगलकामना व्यक्त करते हुए शीघ्रातिशीघ्र मोक्षगामी बनने की कामना की। उग्र विहारी तपोमूर्ति मुनि श्री कमल कुमार जी एवं विराजित चरित्रत्माओं ने साध्वी मनुयशा जी की आत्मा के उर्ध्वारोहण के लिए चार लोग्गस का ध्यान करवाया।

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