
बीकानेर,शादी/ विवाह सभी देश दुनियां के मजहब , समाज, कुनबे,कबीलों में होते आ रहे है ये सामाजिक ,धार्मिक परम्पराओं से होते हैं इनको सार्वजनिक रूप से लड़के,लड़की को निकाह व सात फेरे की प्रक्रिया द्वारा आपसी सहमति से सादगीपूर्ण तरीके से हुआ करती थी ।
लेकिन आज के शादी ब्याह समय परिस्थितियों के बदलाव से भव्य आयोजन में होने लगे है । शादी के सभी पारंपरिक रीतिरिवाज पर फिल्मी छाया का असर देखने को मिलता है , आज के दौर में शादियों का खर्च मध्यम परिवारों के लिए असहनीय सा हो गया है फिर भी लोगों में देखा देखी की होड़म होड से लड़के लड़की के चयन से लेकर सगाई दस्तूर रिंग सेरेमनी इन आयोजनों ने घर से होटलों में चकाचौंध से अनावश्यक खर्च जैसे र्फोटो ,वीडियो,खाना ,डांस- संगीत साज आदि होने लगे हैं। इन आयोजनों को दोनों तरफ के लोग आज के मीडिया में उस आयोजन के चर्चे करते हैं जिस से आम लड़की के मां बाप के जहन में अपनी लड़कियों की फिक्र होने लगती है ।
आजकल शादी में कार्ड से लेकर् शादी सम्पन्न होने तक के बड़े आयोजन – लेडीज संगीत , मेहंदी – हल्दी रस्म फ़िर शादी के मुख्य समारोह मैरिज गार्डन ,मैरिज पैलेस , भवन आदि में अनाप शनाप खर्च किए जाते हैं ,जहां सारे कार्यक्रम बॉलीवुड की तर्ज पर होते हैं जो छः से भी पार अंकों के खर्च में होने लगे हैं।
बड़े खर्च में भवन ,हलवाई ,शामियाना टैंट ,, खाने में विभिन्न व्यंजन , मल्टी डिश, मल्टी स्टाल ,भवन की साज सज्जा, डेकोरेशन व फोटो वीडियो आदि सभी की एडवांस बुकिंग होती है। अनेक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद फिर दहेज़ विदाई तक पैसा पग पग पर 7 अंकों तक लगता है ।
एक जमाना था सगाई ,मेहंदी हल्दी रस्म घर परिवार में हो जाती थी संगीत कार्यक्रम में पारंपरिक रीतिरिवाज के गीत संगीत , मंगल गीत घर की औरतें कर लिया करती थी।आजकल हर आयोजन में संख्या भी अनलिमिटेड होने लगी हैओर अनावश्यक खर्च भी बढ़ जाता है ।
आम मां बाप की चिंता,लड़की के जन्म से ही मां बाप लड़की की शादी की तैयारी में लग जाते हैं। आजकल बुजुर्गो ,पंच पंचायत से राय मस्वोरा होता नहीं हर चीज में फिजूल खर्चा होने लगा है भोजन वैफे सिस्टम में वेस्टेज ज्यादा होता है। 200 आदमी तो फिजूल में खा जाते हैं जैसे हलवाई की फौज , वेटर, साफ़ सफाई , बिजली , डकोरेशन ,फोटो वीडियो टीम आदि के लोग । इतना अपव्यय
समाज के पढ़े लिखे लोगों को आगे बढ़ कर शादी ब्याह में सादापन लाने के लिए सुधारात्मक कदम उठाने की आवश्यकता है अन्यथा इन आयोजनों में खेत, जमीन बेचनी पड़ती है या कर्जदार होना पड़ता है , बहुत सी बेटियों के रिश्ते नहीं हो पाते हैं ,दहेज के कारण बहुत सी अनहोनी घटनाएं होने लगती है। आओ इस आडम्बर पूर्ण भव्य आयोजनो व फिजूल खर्च से निजात पाकर समाज में सम्मान जनक जीवन जीने के लिए सुधारात्मक कदम उठाएं । कुछ आदर्श शादियां भी वर्तमान में बिना दहेज ,बिना किसी तामझाम के दोनों घर परिवार के लिमिटेड संख्या में एक रुपया नारियल में सादगी से होने लगी है , समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियों व धनी परिवारों को दो कदम आगे बढ़ पहल करनी चाहिए ।