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श्रीडूंगरगढ,बीकानेर,श्रीडूंगरगढ़ के कालूबास में मोहता पैलेस में कन्हैयालाल जोशी परिवार की ओर से आयोजित श्रीमदभागवत कथा के पंचम दिवस की संगीतमय कथा सुनाते हुए युवा कथावाचक संतोष सागर जी महाराज ने सैकड़ों श्रोताओं को रस- विभोर कर दिया। पंचम दिवस की कथा में बालकृष्ण की अनुपम कथाएं सुनाई गई।
आपने कहा कि सुख- दुख की अनुभूति तो पशु भी करता है। पर आनंद की अनुभूति हर कोई नहीं कर सकता। हृदय शुद्ध होने पर ही आनंद की अनुभूति संभव होती है। यह तो हर कोई जानता है कि संसार दुखालय है, यहां संसार का आश्रय ग्रहण करोगे तो दुख ही बदले में मिलेगा। परन्तु जो भगवान का दासत्व ग्रहण करता है वह सुख का अनुभव कर सकता है। यहां सुख दुख को भी समझने की जरूरत है, क्योंकि सुख दुख भी शाश्वत नहीं है। शाश्वत तो आनंद है।
युवा कथावाचक ने लीलाओं को सुनाते हुए श्रोताओं पूछा कि वैष्णव कौन है? फिर कहा शिव ही सबसे बड़े वैष्णव है। शिव भगवान विष्णु के समस्त रूपों के उपासक हैं, इसलिए कृष्ण की लीलाएं देखने गोकुल में आते हैं। आपने कहा कि जो महादेव की शरणागति में चला जाता है, उसे रोना नहीं पड़ता।
महाराज ने कथा में कहा कि गोकुल में रोज भिन्न-भिन्न प्रकार के धार्मिक उत्सव होते हैं। वे व्यक्ति सौभाग्यशाली होते हैं, जिनके घरों में भगवान के उत्सव होते हैं।
अनेक कृष्ण लीलाओं का वर्णन करते हुए आपने कहा कि अविद्या के प्रसार से गलत कार्य होते हैं। अविद्या आदमी को अपवित्र बना देती है। पूतना भगवान को विषपान कराने आती है। पूतना का मतलब होता है जो पवित्र नहीं है। अपवित्र ही पूतना है। आप ने जोर देते हुए कहा कि जीवन में भाव की शुद्धि बहुत जरूरी है। भाव प्रधान लोगों में थोड़ा सा ज्ञान भी होना चाहिए। घर का मंदिर बड़ा होना चाहिए। अधिक फोटोग्राफ की जरूरत नहीं। जो भगवान को पूजता है, वह भगवान को प्राप्त होता है। घर के मंदिर स्वच्छ होने चाहिए। ठाकुर जी को घर के सदस्य मानकर पूजा करें। उनसे औपचारिक सम्बन्ध न रखें।

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